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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 3

191 Sukta
24 Mantra
1/23/3
Devata- इन्द्रवायू Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒न्द्र॒वा॒यू म॑नो॒जुवा॒ विप्रा॑ हवन्त ऊ॒तये॑। स॒ह॒स्रा॒क्षा धि॒यस्पती॑॥

इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑ । म॒नः॒ऽजुवा॑ । विप्राः॑ । ह॒व॒न्ते॒ । ऊ॒तये॑ । स॒ह॒स्र॒ऽअ॒क्षा । धि॒यः । पती॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये। सहस्राक्षा धियस्पती॥

इन्द्रवायू इति। मनःऽजुवा। विप्राः। हवन्ते। ऊतये। सहस्रऽअक्षा। धियः। पती इति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(विप्राः) विद्वान् लोग (ऊतये) क्रियासिद्धि की इच्छा के लिये जो (सहस्राक्षा) जिन से असंख्यात अक्ष अर्थात् इन्द्रियवत् साधन सिद्ध होते (धियः) शिल्प कर्म के (पती) पालने और (मनोजुवा) मन के समान वेगवाले हैं, उन (इन्द्रवायू) विद्युत् और पवन को (हवन्ते) ग्रहण करते हैं, उनके जानने की इच्छा अन्य लोग भी क्यों न करें॥३॥
Essence
विद्वानों को उचित है कि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये असंख्यात व्यवहारों को सिद्ध करानेवाले वेग आदि गुणयुक्त बिजुली और वायु के गुणों की क्रियासिद्धि के लिये अच्छे प्रकार सिद्धि करनी चाहिये॥३॥
Subject
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-