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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 21

191 Sukta
24 Mantra
1/23/21
Devata- आपः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- प्रतिष्ठागायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आपः॑ पृणी॒त भे॑ष॒जं वरू॑थं त॒न्वे॒३॒॑ मम॑। ज्योक् च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥

आपः॑ । पृ॒णी॒त । भे॒ष॒जम् । वरू॑थम् । त॒न्वे॑ । मम॑ । ज्योक् । च॒ । सूर्य॑म् । दृ॒शे ॥

Mantra without Swara
आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे३ मम। ज्योक् च सूर्यं दृशे॥

आपः। पृणीत। भेषजम्। वरूथम्। तन्वे। मम। ज्योक्। च। सूर्यम्। दृशे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को योग्य है कि सब पदार्थों को व्याप्त होनेवाले प्राण (सूर्य्यम्) सूर्यलोक के (दृशे) दिखलाने वा (ज्योक्) बहुत काल जिवाने के लिये (मम) मेरे (तन्वे) शरीर के लिये (वरूथम्) श्रेष्ठ (भेषजम्) रोगनाश करनेवाले व्यवहार को (पृणीत) परिपूर्णता से प्रकट कर देते हैं, उनका सेवन युक्ति ही से करना चाहिये॥२१॥
Essence
प्राणों के विना कोई प्राणी वा वृक्ष आदि पदार्थ बहुत काल शरीर धारण करने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे क्षुधा और प्यास आदि रोगों के निवारण के लिये परम अर्थात् उत्तम से उत्तम औषधों को सेवने से योगयुक्ति से प्राणों का सेवन ही परम उत्तम है, ऐसा जानना चाहिये।
Subject
फिर वे जल कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-