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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 2

191 Sukta
24 Mantra
1/23/2
Devata- इन्द्रवायू Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशे॑न्द्रवा॒यू ह॑वामहे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

उ॒भा । दे॒वा । दि॒वि॒ऽस्पृशा॑ । इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ । अ॒स्य । सोम॑स्य । पी॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे। अस्य सोमस्य पीतये॥

उभा। देवा। दिविऽस्पृशा। इन्द्रवायू इति। हवामहे। अस्य। सोमस्य। पीतये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हम लोग (अस्य) इस प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष (सोमस्य) उत्पन्न करनेवाले संसार के सुख के (पीतये) भोगने के लिये (दिविस्पृशा) जो प्रकाशयुक्त आकाश में विमान आदि यानों को पहुँचाने और (देवा) दिव्यगुणवाले (उभा) दोनों (इन्द्रवायू) अग्नि और पवन हैं, उनको (हवामहे) साधने की इच्छा करते हैं॥२॥
Essence
जो अग्नि पवन और जो वायु अग्नि से प्रकाशित होता है, जो ये दोनों परस्पर आकाङ्क्षायुक्त अर्थात् सहायकारी हैं, जिनसे सूर्य्य प्रकाशित होता है, मनुष्य लोग जिनको साध और युक्ति के साथ नित्य क्रियाकुशलता में सम्प्रयोग करते हैं, जिनके सिद्ध करने से मनुष्य बहुत से सुखों को प्राप्त होते हैं, उनके जानने की इच्छा क्यों न करनी चाहिये॥२॥
Subject
अब अगले मन्त्र में परस्पर संयोग करनेवाले पदार्थों का प्रकाश किया है-