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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 19

191 Sukta
24 Mantra
1/23/19
Devata- आपः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पुरउष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒प्स्व१न्तर॒मृत॑म॒प्सु भे॑ष॒जम॒पामु॒त प्रश॑स्तये। देवा॒ भव॑त वा॒जिनः॑॥

अ॒प्ऽसु । अ॒न्तः । अ॒मृत॑म् । अ॒प्ऽसु । भे॒ष॒जम् । अ॒पाम् । उ॒त । प्रऽश॑स्तये । देवाः॑ । भव॑त । वा॒जिनः॑ ॥

Mantra without Swara
अप्स्व१न्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः॥

अप्ऽसु। अन्तः। अमृतम्। अप्ऽसु। भेषजम्। अपाम्। उत। प्रऽशस्तये। देवाः। भवत। वाजिनः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 4

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Meaning
हे (देवाः) विद्वानो ! तुम (प्रशस्तये) अपनी उत्तमता के लिये (अप्सु) जलों के (अन्तः) भीतर जो (अमृतम्) मार डालनेवाले रोग का निवारण करनेवाला अमृतरूप रस (उत) तथा (अप्सु) जलों में (भेषजम्) औषध हैं, उनको जानकर (अपाम्) उन जलों की क्रियाकुशलता से (वाजिनः) उत्तम श्रेष्ठ ज्ञानवाले (भवत) हो जाओ॥१९॥
Essence
हे मनुष्यो तुम अमृतरूपी रस वा ओषधिवाले जलों से शिल्प और वैद्यकशास्त्र की विद्या से उनके गुणों को जानकर कार्य्य की सिद्धि वा सब रोगों की निवृत्ति नित्य करो॥१९॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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