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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 18

191 Sukta
24 Mantra
1/23/18
Devata- आपः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये॒ यत्र॒ गावः॒ पिब॑न्ति नः। सिन्धु॑भ्यः॒ कर्त्वं॑ ह॒विः॥

अ॒पः । दे॒वीः । उप॑ । ह्व॒ये॒ । यत्र॑ । गावः॑ । पिब॑न्ति । नः॒ । सिन्धु॑ऽभ्यः । कर्त्व॑म् । ह॒विः ॥

Mantra without Swara
अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः। सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः॥

अपः। देवीः। उप। ह्वये। यत्र। गावः। पिबन्ति। नः। सिन्धुऽभ्यः। कर्त्वम्। हविः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्र) जिस व्यवहार में (गावः) सूर्य की किरणें (सिन्धुभ्यः) समुद्र और नदियों से (देवीः) दिव्यगुणों को प्राप्त करनेवाले (अपः) जलों को (पिबन्ति) पीती हैं, उन जलों को (नः) हम लोगों के (हविः) हवन करने योग्य पदार्थों के (कर्त्वम्) उत्पन्न करने के लिये मैं (उपह्वये) अच्छे प्रकार स्वीकार करता हूँ॥१८॥
Essence
सूर्य की किरणें जितना जल छिन्न-भिन्न अर्थात् कण-कण कर वायु के संयोग से खैंचती हैं, उतना ही वहाँ से निवृत्त होकर भूमि और ओषधियों को प्राप्त होता है। विद्वान् लोगों को वह जल, पान, स्नान और शिल्पकार्य आदि में संयुक्त कर नाना प्रकार के सुख सम्पादन करने चाहिये॥१८॥
Subject
फिर भी वे जल किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-