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Rigveda Mandal 1 / Sukta 23 / Mantra 15

191 Sukta
24 Mantra
1/23/15
Devata- पूषा Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒तो स मह्य॒मिन्दु॑भिः॒ षड्यु॒क्ताँ अ॑नु॒सेषि॑धत्। गोभि॒र्यवं॒ न च॑र्कृषत्॥

उ॒तो इति॑ । सः । मह्य॑म् । इन्दु॑ऽभिः । षट् । यु॒क्तान् । अ॒नु॒ऽसेसि॑धत् । गोभिः॑ । यव॑म् । न । च॒र्कृ॒ष॒त् ॥

Mantra without Swara
उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत्। गोभिर्यवं न चर्कृषत्॥

उतो इति। सः। मह्यम्। इन्दुऽभिः। षट्। युक्तान्। अनुऽसेसिधत्। गोभिः। यवम्। न। चर्कृषत्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 5

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Meaning
जैसे खेती करनेवाला मनुष्य हर एक अन्न की सिद्धि के लिये भूमि को (चर्कृषत्) वारंवार जोतता है (न) वैसे (सः) वह ईश्वर (मह्यम्) जो मैं धर्मात्मा पुरुषार्थी हूँ, उसके लिये (इन्दुभिः) स्निग्ध मनोहर पदार्थों और वसन्त आदि (षट्) छः (ऋतून्) ऋतुओं को (युक्तान्) (गोभिः) गौ, हाथी और घोड़े आदि पशुओं के साथ सुखसंयुक्त और (यवम्) यव आदि अन्न को (अनुसेषिधत्) वारंवार हमारे अनुकूल प्राप्त करे, इससे मैं उसी को इष्टदेव मानता हूँ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य वा खेती करनेवाला किरण वा हल आदि से वारंवार भूमि को आकर्षित वा खन, बो और धान्य आदि की प्राप्ति कर सचिक्कनकर पदार्थों के सेवन के साथ वसन्त आदि छः ऋतुओं को सुखों से संयुक्त करता है, वैसे ईश्वर भी समय के अनुकूल सब जीवों को कर्मों के अनुसार रस को उत्पन्न वा ऋतुओं के विभाग से उक्त ऋतुओं को सुख देनेवाली करता है॥१५॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में उस ईश्वर ही के गुणों का उपदेश किया है-

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