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Rigveda Mandal 1 / Sukta 22 / Mantra 4

191 Sukta
21 Mantra
1/22/4
Devata- अश्विनौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न॒हि वा॒मस्ति॑ दूर॒के यत्रा॒ रथे॑न॒ गच्छ॑थः। अश्वि॑ना सो॒मिनो॑ गृ॒हम्॥

न॒हि । वा॒म् । अस्ति॑ । दू॒र॒के । यत्र॑ । रथे॑न । गच्छ॑थः । अश्वि॑ना । सो॒मिनः॑ । गृ॒हम् ॥

Mantra without Swara
नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः। अश्विना सोमिनो गृहम्॥

नहि। वाम्। अस्ति। दूरके। यत्र। रथेन। गच्छथः। अश्विना। सोमिनः। गृहम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे रथों के रचने वा चलानेहारे सज्जन लोगो ! तुम (यत्र) जहाँ उक्त (अश्विना) अश्वियों से संयुक्त (रथेन) विमान आदि यान से (सोमिनः) जिसके प्रशंसनीय पदार्थ विद्यमान हैं, उस पदार्थविद्या वाले के (गृहम्) घर को (गच्छथः) जाते हो, वह दूरस्थान भी (वाम्) तुमको (दूरके) दूर (नहि) नहीं है॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस कारण अग्नि और जल के वेग से युक्त किया हुआ रथ अति दूर भी स्थानों को शीघ्र पहुँचाता है, इससे तुम लोगों को भी यह शिल्पविद्या का अनुष्ठान निरन्तर करना चाहिये॥४॥
Subject
इसको करके अश्वियों के योग से क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-