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Rigveda Mandal 1 / Sukta 22 / Mantra 2

191 Sukta
21 Mantra
1/22/2
Devata- अश्विनौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
या सु॒रथा॑ र॒थीत॑मो॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशा॑। अ॒श्विना॒ ता ह॑वामहे॥

या । सु॒ऽरथा॑ । र॒थिऽत॑मा । उ॒भा । दे॒वा । दि॒वि॒ऽस्पृशा॑ । अ॒श्विना॑ । ता । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
या सुरथा रथीतमोभा देवा दिविस्पृशा। अश्विना ता हवामहे॥

या। सुऽरथा। रथिऽतमा। उभा। देवा। दिविऽस्पृशा। अश्विना। ता। हवामहे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हम लोग (या) जो (दिविस्पृशा) आकाशमार्ग से विमान आदि यानों को एक स्थान से दूसरे स्थान में शीघ्र पहुँचाने (रथीतमा) निरन्तर प्रशंसनीय रथों को सिद्ध करनेवाले (सुरथा) जिनके योग से उत्तम-उत्तम रथ सिद्ध होते हैं (देवा) प्रकाशादि गुणवाले (अश्विनौ) व्याप्ति स्वभाववाले पूर्वोक्त अग्नि और जल हैं, (ता) उन (उभा) एक-दूसरे के साथ संयोग करने योग्यों को (हवामहे) ग्रहण करते हैं॥२॥
Essence
जो मनुष्यों के लिये अत्यन्त सिद्धि करानेवाले अग्नि और जल हैं, वे शिल्पविद्या में संयुक्त किये हुए कार्य्यसिद्धि के हेतु होते हैं॥२॥
Subject
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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