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Rigveda Mandal 1 / Sukta 22 / Mantra 18

191 Sukta
21 Mantra
1/22/18
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्रीणि॑ प॒दा वि च॑क्रमे॒ विष्णु॑र्गो॒पा अदा॑भ्यः। अतो॒ धर्मा॑णि धा॒रय॑न्॥

त्रीणि॑ । प॒दा । वि । च॒क्र॒मे॒ । विष्णुः॑ । गो॒पाः । अदा॑भ्यः । अतः॑ । धर्मा॑णि । धा॒रय॑न् ॥

Mantra without Swara
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्॥

त्रीणि। पदा। वि। चक्रमे। विष्णुः। गोपाः। अदाभ्यः। अतः। धर्माणि। धारयन्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जिस कारण यह (अदाभ्यः) अपने अविनाशीपन से किसी की हिंसा में नहीं आ सकता (गोपाः) और सब संसार की रक्षा करनेवाला, सब जगत् को (धारयन्) धारण करनेवाला (विष्णुः) संसार का अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) तीन प्रकार के (पदानि) जाने, जानने और प्राप्त होने योग्य पदार्थों और व्यवहारों को (विचक्रमे) विधान करता है, इसी कारण से सब पदार्थ उत्पन्न होकर अपने-अपने (धर्माणि) धर्मों को धारण कर सकते हैं॥१८॥
Essence
ईश्वर के धारण के विना किसी पदार्थ की स्थिति होने का सम्भव नहीं हो सकता। उसकी रक्षा के विना किसी के व्यवहार की सिद्धि भी नहीं हो सकती॥१८॥
Subject
फिर वह सर्वव्यापक जगदीश्वर क्या-क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-