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Rigveda Mandal 1 / Sukta 22 / Mantra 15

191 Sukta
21 Mantra
1/22/15
Devata- पृथिवी Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्यो॒ना पृ॑थिवि भवानृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी। यच्छा॑ नः॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑॥

स्यो॒ना । पृ॒थि॒वि॒ । भ॒व॒ । अ॒नृ॒क्ष॒रा । नि॒ऽवेश॑नी । यच्छ॑ । नः॒ । शर्म॑ । स॒ऽप्रथः॑ ॥

Mantra without Swara
स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथः॥

स्योना। पृथिवि। भव। अनृक्षरा। निऽवेशनी। यच्छ। नः। शर्म। सऽप्रथः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो यह (पृथिवी) अति विस्तारयुक्त (स्योना) अत्यन्त सुख देने तथा (अनृक्षरा) जिसमें दुःख देनेवाले कण्टक आदि न हों (निवेशनी) और जिसमें सुख से प्रवेश कर सकें, वैसी (भव) होती है, सो (नः) हमारे लिये (सप्रथः) विस्तारयुक्त सुखकारक पदार्थवालों के साथ (शर्म्म) उत्तम सुख को (यच्छ) देती है॥१५॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है, कि यह भूमि ही सब मूर्त्तिमान् पदार्थों के रहने की जगह और अनेक प्रकार के सुखों की करानेवाली और बहुत रत्नों को प्राप्त करानेवाली होती है, ऐसा ज्ञान करें॥१५॥
Subject
यह भूमि किसलिये और कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-