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Rigveda Mandal 1 / Sukta 22 / Mantra 14

191 Sukta
21 Mantra
1/22/14
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तयो॒रिद्घृ॒तव॒त्पयो॒ विप्रा॑ रिहन्ति धी॒तिभिः॑। ग॒न्ध॒र्वस्य॑ ध्रु॒वे प॒दे॥

तयोः॑ । इत् । घृ॒तऽव॑त् । पयः॑ । विप्राः॑ । रि॒ह॒न्ति॒ । धी॒तिऽभिः॑ । ग॒न्ध॒र्वस्य॑ । ध्रु॒वे । प॒दे ॥

Mantra without Swara
तयोरिद्घृतवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः। गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे॥

तयोः। इत्। घृतऽवत्। पयः। विप्राः। रिहन्ति। धीतिऽभिः। गन्धर्वस्य। ध्रुवे। पदे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 4

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Meaning
जो (विप्राः) बुद्धिमान् पुरुष जिनसे प्रशंसनीय होते हैं (तयोः) उन प्रकाशमय और अप्रकाशमय लोकों के (धीतिभिः) धारण और आकर्षण आदि गुणों से (गन्धर्वस्य) पृथिवी को धारण करनेवाले वायु का (ध्रुवे) जो सब जगह भरा निश्चल (पदे) अन्तरिक्ष स्थान है, उसमें विमान आदि यानों को (रिहन्ति) गमनागमन करते हैं, वे प्रशंसित होके, उक्त लोकों ही के आश्रय से (घृतवत्) प्रशंसनीय जलवाले (पयः) रस आदि पदार्थों को ग्रहण करते हैं॥१४॥
Essence
विद्वानों को पृथिवी आदि पदार्थों से विमान आदि यान बनाकर उनकी कलाओं में जल और अग्नि के प्रयोग से भूमि, समुद्र और आकाश में जाना आना चाहिये॥१४॥
Subject
उक्त दो प्रकार के लोकों से क्या-क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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