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Rigveda Mandal 1 / Sukta 22 / Mantra 12

191 Sukta
21 Mantra
1/22/12
Devata- इन्द्राणीवरुणान्यग्नाय्यः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒हेन्द्रा॒णीमुप॑ ह्वये वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑। अ॒ग्नायीं॒ सोम॑पीतये॥

इ॒ह । इ॒न्द्रा॒णीम् । उप॑ । ह्व॒ये॒ । व॒रु॒णा॒नीम् । स्व॒स्तये॑ । अ॒ग्नायी॑म् । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणानीं स्वस्तये। अग्नायीं सोमपीतये॥

इह। इन्द्राणीम्। उप। ह्वये। वरुणानीम्। स्वस्तये। अग्नायीम्। सोमऽपीतये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य लोगो ! जैसे हम लोग (इह) इस व्यवहार में (स्वस्तये) अविनाशी प्रशंसनीय सुख वा (सोमपीतये) ऐश्वर्य्यों का जिसमें भोग होता है, उस कर्म के लिये जैसा (इन्द्राणीम्) सूर्य्य (वरुणानीम्) वायु वा जल और (अग्नायीम्) अग्नि की शक्ति हैं, वैसी स्त्रियों को पुरुष और पुरुषों को स्त्री लोग (उपह्वये) उपयोग के लिये स्वीकार करें, वैसे तुम भी ग्रहण करो॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को उचित है कि ईश्वर के बनाये हुए पदार्थों के आश्रय से अविनाशी निरन्तर सुख की प्राप्ति के लिये उद्योग करके परस्पर प्रसन्नतायुक्त स्त्री और पुरुष का विवाह करें, क्योंकि तुल्य स्त्री पुरुष और पुरुषार्थ के विना किसी मनुष्य को कुछ भी ठीक-ठीक सुख का सम्भव नहीं हो सकता॥१२॥
Subject
फिर वे कैसी देवपत्नी हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-