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Rigveda Mandal 1 / Sukta 21 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/21/5
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता म॒हान्ता॒ सद॒स्पती॒ इन्द्रा॑ग्नी॒ रक्ष॑ उब्जतम्। अप्र॑जाः सन्त्व॒त्रिणः॑॥

ता । म॒हान्ता॑ । सद॒स्पती॒ इति॑ । इन्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । रक्षः॑ । उ॒ब्ज॒त॒म् । अप्र॑जाः । स॒न्तु॒ । अ॒त्रिणः॑ ॥

Mantra without Swara
ता महान्ता सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतम्। अप्रजाः सन्त्वत्रिणः॥

ता। महान्ता। सदस्पती इति। इन्द्राग्नी इति। रक्षः। उब्जतम्। अप्रजाः। सन्तु। अत्रिणः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों ने जो अच्छी प्रकार क्रिया की कुशलता में संयुक्त किये हुए (महान्ता) बड़े-बड़े उत्तम गुणवाले (ता) पूर्वोक्त (सदस्पती) सभाओं के पालन के निमित्त (इन्द्राग्नी) वायु और अग्नि हैं, जो (रक्षः) दुष्ट व्यवहारों को (उब्जतम्) नाश करते और उनसे (अत्रिणः) शत्रु जन (अप्रजाः) पुत्रादिरहित (सन्तु) हों, उनका उपयोग सब लोग क्यों न करें॥५॥
Essence
विद्वानों को योग्य है कि जो सब पदार्थों के स्वरूप वा गुणों से अधिक वायु और अग्नि हैं, उनको अच्छी प्रकार जानकर क्रियाव्यवहार में संयुक्त करें, तो वे दुःखों को निवारण करके अनेक प्रकार की रक्षा करनेवाले होते हैं॥५॥
Subject
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-