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Rigveda Mandal 1 / Sukta 21 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/21/3
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता मि॒त्रस्य॒ प्रश॑स्तय इन्द्रा॒ग्नी ता ह॑वामहे। सो॒म॒पा सोम॑पीतये॥

ता । मि॒त्रस्य॑ । प्रऽश॑स्तये । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । ता । ह॒वा॒म॒हे॒ । सो॒म॒ऽपा । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे। सोमपा सोमपीतये॥

ता। मित्रस्य। प्रऽशस्तये। इन्द्राग्नी इति। ता। हवामहे। सोमऽपा। सोमऽपीतये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
जैसे विद्वान् लोग वायु और अग्नि के गुणों को जानकर उपकार लेते हैं, वैसे हम लोग भी (ता) उन पूर्वोक्त (मित्रस्य) सबके उपकार करनेहारे और सब के मित्र के (प्रशस्तये) प्रशंसनीय सुख के लिये तथा (सोमपीतये) सोम अर्थात् जिस व्यवहार में संसारी पदार्थों की अच्छी प्रकार रक्षा होती है, उसके लिये (ता) उन (सोमपा) सब पदार्थों की रक्षा करनेवाले (इन्द्राग्नी) वायु और अग्नि को (हवामहे) स्वीकार करते हैं॥३॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जब मनुष्य मित्रपन का आश्रय लेकर एक दूसरे के उपकार के लिये विद्या से वायु और अग्नि को कार्य्यों में संयुक्त करके रक्षा के साथ पदार्थ और व्यवहारों की उन्नति करते हैं, तभी वे सुखी होते हैं॥३॥
Subject
वे किस उपकार के करनेवाले होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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