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Rigveda Mandal 1 / Sukta 21 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/21/2
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता य॒ज्ञेषु॒ प्र शं॑सतेन्द्रा॒ग्नी शु॑म्भता नरः। ता गा॑य॒त्रेषु॑ गायत॥

ता । य॒ज्ञेषु॑ । प्र । शं॒स॒त॒ । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । शु॒म्भ॒त॒ । न॒रः॒ । ता । गा॒य॒त्रेषु॑ । गा॒य॒त॒ ॥

Mantra without Swara
ता यज्ञेषु प्र शंसतेन्द्राग्नी शुम्भता नरः। ता गायत्रेषु गायत॥

ता। यज्ञेषु। प्र। शंसत। इन्द्राग्नी इति। शुम्भत। नरः। ता। गायत्रेषु। गायत॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) यज्ञ करनेवाले मनुष्यो ! तुम जिस पूर्वोक्त (इन्द्राग्नी) वायु और अग्नि के (प्रशंसत) गुणों को प्रकाशित तथा (शुम्भत) सब जगह कामों में प्रदीप्त करते हो (ता) उनको (गायत्रेषु) गायत्री छन्दवाले वेद के स्तोत्रों में (गायत) षड्ज आदि स्वरों से गाओ॥२॥
Essence
कोई भी मनुष्य अभ्यास के विना वायु और अग्नि के गुणों के जानने वा उनसे उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकते॥२॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-