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Rigveda Mandal 1 / Sukta 20 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/20/6
Devata- ऋभवः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त त्यं च॑म॒सं नवं॒ त्वष्टु॑र्दे॒वस्य॒ निष्कृ॑तम्। अक॑र्त च॒तुरः॒ पुनः॑॥

उ॒त । त्यम् । च॒म॒सम् । नव॑म् । त्वष्टुः॑ । दे॒वस्य॑ । निःऽकृ॑तम् । अक॑र्त । च॒तुरः॑ । पुन॒रिति॑ ॥

Mantra without Swara
उत त्यं चमसं नवं त्वष्टुर्देवस्य निष्कृतम्। अकर्त चतुरः पुनः॥

उत। त्यम्। चमसम्। नवम्। त्वष्टुः। देवस्य। निःऽकृतम्। अकर्त। चतुरः। पुनरिति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जब विद्वान् लोग जो (त्वष्टुः) शिल्पी अर्थात् कारीगर (देवस्य) विद्वान् का (निष्कृतम्) सिद्ध किया हुआ काम सुख का देनेवाला है, (त्यम्) उस (नवम्) नवीन दृष्टिगोचर कर्म को देखकर (उत) निश्चय से (पुनः) उसके अनुसार फिर (चतुरः) भू, जल, अग्नि और वायु से सिद्ध होनेवाले शिल्पकामों को (अकर्त्त) अच्छी प्रकार सिद्ध करते हैं, तब आनन्दयुक्त होते हैं॥६॥
Essence
मनुष्य लोग किसी क्रियाकुशल कारीगर के निकट बैठकर उसकी चतुराई को दृष्टिगोचर करके फिर सुख के साथ कारीगरी काम करने को समर्थ हो सकते हैं॥६॥
Subject
उक्त कार्य्य के करने में किसका सामर्थ्य होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।