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Rigveda Mandal 1 / Sukta 2 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/2/5
Devata- इन्द्रवायू Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वाय॒विन्द्र॑श्च चेतथः सु॒तानां॑ वाजिनीवसू। तावा या॑त॒मुप॑ द्र॒वत्॥

वायो॒ इति॑ । इन्द्रः॑ । च॒ । चे॒त॒थः॒ । सु॒ताना॑म् । वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू । तौ । आ । या॒त॒म् । उप॑ । द्र॒वत् ॥

Mantra without Swara
वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्रवत्॥

वायो इति। इन्द्रः। च। चेतथः। सुतानाम्। वाजिनीवसू इति वाजिनीऽवसू। तौ। आ। यातम्। उप। द्रवत्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 3 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वायो) ज्ञानस्वरूप ईश्वर ! आपके रचे हुए (वाजिनीवसू) उषा काल के तुल्य प्रकाश और वेग से युक्त (इन्द्रश्च) पूर्वोक्त सूर्य्यलोक और वायु (सुतानाम्) आपके उत्पन्न किये हुए पदार्थों का (चेतथः) धारण और प्रकाश करके उनको जीवों के दृष्टिगोचर कराते हैं, इसी कारण (तौ) वे दोनों उन पदार्थों को (द्रवत्) शीघ्रता से (आयातमुप) प्राप्त होते हैं॥५॥
Essence
यदि परमेश्वर इन सूर्यलोक और वायु को न बनावे, तो ये दोनों अपने कार्य को करने में कैसे समर्थ होवें॥५॥
Subject
अब पूर्वोक्त सूर्य्य और पवन, जो कि ईश्वर ने धारण किये हैं, वे किस-किस कर्म की सिद्धि के निमित्त रचे गये हैं, इस विषय का अगले मन्त्र में उपदेश किया है-