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Rigveda Mandal 1 / Sukta 190 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/190/6
Devata- बृहस्पतिः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒प्रैतु॑: सू॒यव॑सो॒ न पन्था॑ दुर्नि॒यन्तु॒: परि॑प्रीतो॒ न मि॒त्रः। अ॒न॒र्वाणो॑ अ॒भि ये चक्ष॑ते॒ नोऽपी॑वृता अपोर्णु॒वन्तो॑ अस्थुः ॥

सु॒प्ऽरैतुः॑ । सु॒ऽयव॑सः । न । पन्था॑ । दुः॒ऽनि॒यन्तुः॑ । परि॑ऽप्रीतः । न । मि॒त्रः । अ॒न॒र्वाणः॑ । अ॒भि । ये । चक्ष॑ते । नः॒ । अपि॑ऽवृताः । अ॒प॒ऽऊ॒र्णु॒वन्तः॑ । अ॒स्थुः॒ ॥

Mantra without Swara
सुप्रैतु: सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तु: परिप्रीतो न मित्रः। अनर्वाणो अभि ये चक्षते नोऽपीवृता अपोर्णुवन्तो अस्थुः ॥

सुप्ऽरैतुः। सुऽयवसः। न। पन्था। दुःऽनियन्तुः। परिऽप्रीतः। न। मित्रः। अनर्वाणः। अभि। ये। चक्षते। नः। अपिऽवृताः। अपऽऊर्णुवन्तः। अस्थुः ॥ १.१९०.६

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 13 Mantra » 1

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Meaning
(ये) जो (अनर्वाणः) धर्म से अन्यत्र अधर्म में अपनी चाल-चलन नहीं रखते (अपीवृताः) और समस्त पदार्थों के निश्चय में वर्त्तमान (नः) हम लोगों को (अपोर्णुवन्तः) अविद्यादि दोषों से न ढाँपते हुए जन (सुयवसः) जिसके सुन्दर अन्न विद्यमान उस (सुप्रैतुः) उत्तम विद्यायुक्त विद्वान् का (पन्थाः) मार्ग (न) जैसे वैसे तथा (दुर्नियन्तुः) जो दुःख से नियम करनेवाला उसके (परिप्रीतः) सब ओर से प्रसन्न (मित्रः) मित्र के (न) समान (अभि, चक्षते) अच्छे प्रकार उपदेश करते हैं वे हम लोगों के उपदेशक (अस्थुः) ठहराये जावें ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन पूर्ण साधन और उपसाधनों से युक्त उत्तम मार्ग से अविद्या युक्तों को विद्या और धर्म के बीच प्राप्त करते और जिसने इन्द्रिय नहीं जीते उसको जितेन्द्रियता देनेवाले मित्र के समान शिष्यों को उत्तम शिक्षा देते हैं, वे इस जगत् में अध्यापक और उपदेशक होने चाहियें ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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