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Rigveda Mandal 1 / Sukta 190 / Mantra 2

191 Sukta
8 Mantra
1/190/2
Devata- बृहस्पतिः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमृ॒त्विया॒ उप॒ वाच॑: सचन्ते॒ सर्गो॒ न यो दे॑वय॒तामस॑र्जि। बृह॒स्पति॒: स ह्यञ्जो॒ वरां॑सि॒ विभ्वाभ॑व॒त्समृ॒ते मा॑त॒रिश्वा॑ ॥

तम् । ऋ॒त्वियाः॑ । उप॑ । वाचः॑ । स॒च॒न्ते॒ । सर्गः॑ । न । यः । दे॒व॒ऽय॒ताम् । अस॑र्जि । बृह॒स्पतिः॑ । सः । हि । अञ्जः॑ । वरां॑सि । विऽभ्वा॑ । अभ॑वत् । सम् । ऋ॒ते । मा॒त॒रिश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
तमृत्विया उप वाच: सचन्ते सर्गो न यो देवयतामसर्जि। बृहस्पति: स ह्यञ्जो वरांसि विभ्वाभवत्समृते मातरिश्वा ॥

तम्। ऋत्वियाः। उप। वाचः। सचन्ते। सर्गः। न। यः। देवऽयताम्। असर्जि। बृहस्पतिः। सः। हि। अञ्जः। वरांसि। विऽभ्वा। अभवत्। सम्। ऋते। मातरिश्वा ॥ १.१९०.२

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 2

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Meaning
(यः) जो (मातरिश्वा) पवन के समान (ऋते) सत्य व्यवहार में (अञ्जः) सभों को कामना करने योग्य (बृहस्पतिः) अनन्त वेदवाणी का पालनेवाला (विभ्वा) व्यापक परमात्मा ने बनाया हुआ (समभवत्) अच्छे प्रकार हो और जो (वरांसि) उत्तम कर्मों को करनेवाला हो (स, हि) वही (देवयताम्) अपने को विद्वान् करते हुओं के बीच (असर्जि) सिद्ध किया जाता है (तम्) उसका (ऋत्वियाः) जो ऋतु समय के योग्य होती वे (वाचः) विद्या सुशिक्षायुक्त वाणी (सर्गः) संसार के (न) समान ही (उप, सचन्ते) सम्बन्ध करती हैं ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे जल नीचे मार्ग से जाकर गढ़ेले में ठहरता वैसे जिसको विद्या शिक्षा प्राप्त होती हैं वह अभिमान छोड़के नम्र हो विद्याशय और उचित कहनेवाला प्रसिद्ध हो, जैसे सर्वत्र व्याप्त ईश्वर ने यथायोग्य विविध प्रकार का जगत् बनाया, वैसे विद्वानों की सेवा करनेवाला समस्त काम करनेवाला हो ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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