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Rigveda Mandal 1 / Sukta 189 / Mantra 7

191 Sukta
8 Mantra
1/189/7
Devata- अग्निः Rishi- अगस्त्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं ताँ अ॑ग्न उ॒भया॒न्वि वि॒द्वान्वेषि॑ प्रपि॒त्वे मनु॑षो यजत्र। अ॒भि॒पि॒त्वे मन॑वे॒ शास्यो॑ भूर्मर्मृ॒जेन्य॑ उ॒शिग्भि॒र्नाक्रः ॥

त्वम् । ताम् । अ॒ग्ने॒ । उ॒भया॑न् । वि । वि॒द्वान् । वेषि॑ । प्र॒ऽपि॒त्वे । मनु॑षः । य॒ज॒त्र॒ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वे । मन॑वे । शास्यः॑ । भूः॒ । म॒र्मृ॒जेन्यः॑ । उ॒शिक्ऽभिः । न । अ॒क्रः ॥

Mantra without Swara
त्वं ताँ अग्न उभयान्वि विद्वान्वेषि प्रपित्वे मनुषो यजत्र। अभिपित्वे मनवे शास्यो भूर्मर्मृजेन्य उशिग्भिर्नाक्रः ॥

त्वम्। ताम्। अग्ने। उभयान्। वि। विद्वान्। वेषि। प्रऽपित्वे। मनुषः। यजत्र। अभिऽपित्वे। मनवे। शास्यः। भूः। मर्मृजेन्यः। उशिक्ऽभिः। न। अक्रः ॥ १.१८९.७

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यजत्र) सत्कार करने योग्य (अग्ने) दुष्टों को शिक्षा देनेवाले (विद्वान्) विद्वान् जन ! जो (त्वम्) आप (तान्) उन (उभयान्) दोनों प्रकार के कुटिल निन्दक वा हिंसक (मनुषः) मनुष्यों को (प्रपित्वे) उत्तमता से प्राप्त समय में (वि, वेषि) प्राप्त होते वह आप (अभिपित्वे) सब ओर से प्राप्त व्यवहार में (मनवे) विचारशील मनुष्य के लिये (शास्यः) शिक्षा करने योग्य (भूः) हूजिये और (उशिग्भिः) कामना करते हुए जनों से (मर्मृजेन्यः) अत्यन्त शोभा करने योग्य आप (नाक्रः) दुष्टों को उल्लंघते नहीं, छोड़ते नहीं, अर्थात् उनकी दुष्टता को निवारण कर उन्हें शिक्षा देते हैं ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन जितना हो सके उतना हिंसक क्रूर और निन्दक जनों को अपने बल से सब ओर से मींजमांज उनका बल नष्ट कर सत्य की कामना करनेवालों को हर्ष दिलाते हैं, वे शिक्षा देनेवाले होकर शुद्ध होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।