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Rigveda Mandal 1 / Sukta 189 / Mantra 2

191 Sukta
8 Mantra
1/189/2
Devata- अग्निः Rishi- अगस्त्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अग्ने॒ त्वं पा॑रया॒ नव्यो॑ अ॒स्मान्त्स्व॒स्तिभि॒रति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑। पूश्च॑ पृ॒थ्वी ब॑हु॒ला न॑ उ॒र्वी भवा॑ तो॒काय॒ तन॑याय॒ शं योः ॥

अग्ने॑ । त्वम् । पा॒र॒य॒ । नव्यः॑ । अ॒स्मान् । स्व॒स्तिऽभिः॑ । अति॑ । दुः॒ऽगाणि॑ । विश्वा॑ । पूः । च॒ । पृ॒थ्वी । ब॒हु॒ला । नः॒ । उ॒र्वी । भव॑ । तो॒काय॑ । तन॑याय । शम् । योः ॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्त्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा। पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शं योः ॥

अग्ने। त्वम्। पारय। नव्यः। अस्मान्। स्वस्तिऽभिः। अति। दुःऽगाणि। विश्वा। पूः। च। पृथ्वी। बहुला। नः। उर्वी। भव। तोकाय। तनयाय। शम्। योः ॥ १.१८९.२

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) परमेश्वर ! (त्वम्) आप (स्वस्तिभिः) सुखों से (अस्मान्) हम लोगों को (विश्वा) समस्त (अति दुर्गाणि) अत्यन्त दुर्ग के व्यवहारों को (पारय) पार कीजिये। जैसे (नव्यः) नवीन विद्वान् और (पूः) पुररूप (बहुला) बहुत पदार्थों को लेनेवाली (उर्वी) विस्तृत (पृथ्वी, च) भूमि भी है वैसे (नः) हमारे (तोकाय) अत्यन्त छोटे और (तनयाय) कुछ बड़े बालक के लिये (शं, योः) सुख को प्राप्त करानेवाले (भव) हूजिये ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर पुण्यात्मा जनों को दुष्ट आचार से अलग रखता और पृथिवी के समान पालना करता है, वैसे विद्वान् जन सुन्दर शिक्षा से उत्तम कर्म करनेवालों को दुष्ट आचरण से अलग कर सुन्दर व्यवहार से रक्षा करता है ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।