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Rigveda Mandal 1 / Sukta 188 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/188/7
Devata- आप्रियः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र॒थ॒मा हि सु॒वाच॑सा॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मम् ॥

प्र॒थ॒मा । हि । सु॒ऽवाच॑सा । होता॑रा । दैव्या॑ । क॒वी इति॑ । य॒ज्ञम् । नः॒ । य॒क्ष॒ता॒म् । इ॒मम् ॥

Mantra without Swara
प्रथमा हि सुवाचसा होतारा दैव्या कवी। यज्ञं नो यक्षतामिमम् ॥

प्रथमा। हि। सुऽवाचसा। होतारा। दैव्या। कवी इति। यज्ञम्। नः। यक्षताम्। इमम् ॥ १.१८८.७

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 9 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (हि) जिस कारण (होतारा) ग्रहणकर्त्ता (दैव्या) दिव्य बोधों में कुशल (प्रथमा) प्रथम विद्या बल को बढ़ानेवाले (सुवाचसा) सुन्दर जिनका वचन (कवी) जो सकल विद्या के वेत्ता अध्यापकोपदेशक जन हैं वे (नः) हमारे (इमम्) इस प्रत्यक्षता से वर्त्तमान (यज्ञम्) धनादि पदार्थों के मेल कराने वा व्यवहार का (यज्ञताम्) सङ्ग करावें ॥ ७ ॥
Essence
इस संसार में जो जिनका उपकार करते हैं, वे उनको सत्कार करने योग्य होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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