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Rigveda Mandal 1 / Sukta 188 / Mantra 5

191 Sukta
11 Mantra
1/188/5
Devata- आप्रियः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि॒राट् स॒म्राड्वि॒भ्वीः प्र॒भ्वीर्ब॒ह्वीश्च॒ भूय॑सीश्च॒ याः। दुरो॑ घृ॒तान्य॑क्षरन् ॥

वि॒राट् । स॒म्राट् । वि॒भ्वीः । प्र॒ऽभ्वीः । ब॒ह्वीः । च॒ । भूय॑सीः । च॒ । याः । दुरः॑ । घृ॒तानि॑ । अ॒क्ष॒र॒न् ॥

Mantra without Swara
विराट् सम्राड्विभ्वीः प्रभ्वीर्बह्वीश्च भूयसीश्च याः। दुरो घृतान्यक्षरन् ॥

विराट्। सम्राट्। विभ्वीः। प्रऽभ्वीः। बह्वीः। च। भूयसीः। च। याः। दुरः। घृतानि। अक्षरन् ॥ १.१८८.५

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! (विराट्) जो विविध प्रकार के गुणों और कर्मों में प्रकाशमान वा (सम्राट्) जो चक्रवर्त्ती के समान विद्याओं में सुन्दरता से प्रकाशमान सो आप (याः) जो (विभ्वीः) व्याप्त होनेवाली (प्रभ्वीः) समर्थ (बह्वीः) बहुत अनेक (भूयसीः, च) और अधिक से अधिक सूक्ष्म मात्रा (दुरः) द्वारे अर्थात् सर्व कार्यसुखों को और (घृतानि, च) जलों को (अक्षरन्) प्राप्त होती हैं, उनको जानो ॥ ५ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सब जगत् की बहुत तत्त्वयुक्त सत्व रजस्तमो गुणवाली सूक्ष्ममात्रा नित्यस्वरूप से सदा वर्त्तमान हैं, उनको लेकर पृथिवीपर्यन्त पदार्थों को जान सब कार्य सिद्ध करने चाहियें ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।