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Rigveda Mandal 1 / Sukta 188 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/188/4
Devata- आप्रियः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिरोज॑सा स॒हस्र॑वीरमस्तृणन्। यत्रा॑दित्या वि॒राज॑थ ॥

प्रा॒चीन॑म् । ब॒र्हिः । ओज॑सा । स॒हस्र॑ऽवीरम् । अ॒स्तृ॒ण॒न् । यत्र॑ । आ॒दि॒त्याः॒ । वि॒ऽराज॑थ ॥

Mantra without Swara
प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्रवीरमस्तृणन्। यत्रादित्या विराजथ ॥

प्राचीनम्। बर्हिः। ओजसा। सहस्रऽवीरम्। अस्तृणन्। यत्र। आदित्याः। विऽराजथ ॥ १.१८८.४

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्र) जिस सनातन कारण में (आदित्याः) सूर्य्यादि लोक (ओजसा) पराक्रम वा प्रताप से (सहस्रवीरम्) सहस्रों जिसमें वीर उस (प्राचीनम्) पुरातन (बर्हिः) अच्छे प्रकार बढ़े हुए विज्ञान को (अस्तृणन्) ढाँपते हैं वहाँ तुम लोग (विराजथ) विशेषता से प्रकाशित होओ ॥ ४ ॥
Essence
जिस सनातन कारण में सूर्य्यादि लोक-लोकान्तर प्रकाशित होते हैं, वहाँ तुम हम प्रकाशित होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।