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Rigveda Mandal 1 / Sukta 188 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/188/2
Devata- आप्रियः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तनू॑नपादृ॒तं य॒ते मध्वा॑ य॒ज्ञः सम॑ज्यते। दध॑त्सह॒स्रिणी॒रिष॑: ॥

तनू॑ऽनपात् । ऋ॒तम् । य॒ते । मध्वा॑ । य॒ज्ञः । सम् । अ॒ज्य॒ते॒ । दध॑त् । स॒ह॒स्रिणीः॑ । इषः॑ ॥

Mantra without Swara
तनूनपादृतं यते मध्वा यज्ञः समज्यते। दधत्सहस्रिणीरिष: ॥

तनूऽनपात्। ऋतम्। यते। मध्वा। यज्ञः। सम्। अज्यते। दधत्। सहस्रिणीः। इषः ॥ १.१८८.२

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सहस्रिणीः) सहस्रों (इषः) अन्नादि पदार्थों को (दधत्) धारण करता हुआ (तनूनपात्) शरीरों को न गिराने न नाश करनेहारा अर्थात् पालनेवाला (यज्ञः) पदार्थों में संयुक्त करने योग्य अग्नि (ऋतम्) यज्ञ, सत्य व्यवहार और जलादि पदार्थ को (मध्वा) मधुरता आदि के साथ (यते) प्राप्त होते हुए जन के लिये (समज्यते) अच्छे प्रकार प्रकट होता है, उसको सब सिद्ध करें ॥ २ ॥
Essence
जिस कर्म से अतुल धन-धान्य प्राप्त होते हैं, उसका अनुष्ठान आरम्भ मनुष्य निरन्तर करें ॥ २ ॥
Subject
अब अध्यापक के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।