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Rigveda Mandal 1 / Sukta 187 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/187/9
Devata- ओषधयः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यत्ते॑ सोम॒ गवा॑शिरो॒ यवा॑शिरो॒ भजा॑महे। वाता॑पे॒ पीव॒ इद्भ॑व ॥

यत् । ते॒ । सो॒म॒ । गोऽआ॑शिरः । यव॑ऽआशिरः । भजा॑महे । वाता॑पे । पीवः॑ । इत् । भ॒व॒ ॥

Mantra without Swara
यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे। वातापे पीव इद्भव ॥

यत्। ते। सोम। गोऽआशिरः। यवऽआशिरः। भजामहे। वातापे। पीवः। इत्। भव ॥ १.१८७.९

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) यवादि ओषधि रसव्यापी ईश्वर ! (गवाशिरः) गौ के रस से बनाये वा (यवाशिरः) यवादि ओषधियों के संयोग से बनाये हुए (ते) उस अन्न के (यत्) जिस सेवनीय अंश को हम लोग (भजामहे) सेवते हैं उससे, हे (वातापे) पवन के समान सब पदार्थों में व्यापक परमेश्वर ! (पीवः) उत्तम वृद्धि करनेवाले (इत्) ही (भव) हूजिये ॥ ९ ॥
Essence
जैसे मनुष्य अन्नादि पदार्थों में उन उन की पाकक्रिया के अनुकूल सब संस्कारों को करते हैं, वैसे रसों को भी रसोचित संस्कारों से सिद्ध करें ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।