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Rigveda Mandal 1 / Sukta 187 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/187/8
Devata- ओषधयः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यद॒पामोष॑धीनां परिं॒शमा॑रि॒शाम॑हे। वाता॑पे॒ पीब॒ इद्भ॑व ॥

यत् । अ॒पाम् । ओष॑धीनाम् । प॒रिं॒शम् । आ॒ऽरि॒शाम॑हे । वाता॑पे । पीवः॑ । इत् । भ॒व॒ ॥

Mantra without Swara
यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे। वातापे पीब इद्भव ॥

यत्। अपाम्। ओषधीनाम्। परिंशम्। आऽरिशामहे। वातापे। पीबः। इत्। भव ॥ १.१८७.८

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (वातापे) पवन के समान सर्वपदार्थ व्यापक परमेश्वर ! हम लोग (अपाम्) जलों और (ओषधीनाम्) सोमादि ओषधियों के (यत्) जिस (परिंशम्) सब ओर से प्राप्त होनेवाले अन्न में विद्यमान अंश को (आरिशामहे) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं उससे आप (पीबः) उत्तम वृद्धि करनेवाले (इत्) ही (भव) हूजिये ॥ ८ ॥
Essence
जल, अन्न और घृत के संस्कार से प्रशंसित अन्न और व्यञ्जन इलायची, मिरच वा घृत, दूध पदार्थों को उत्तम बनाकर उन पदार्थों के भोजन करनेवाले जन युक्त आहार और विहार से पुष्ट होवें ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।