Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 187 / Mantra 5

191 Sukta
11 Mantra
1/187/5
Devata- ओषधयः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तव॒ त्ये पि॑तो॒ दद॑त॒स्तव॑ स्वादिष्ठ॒ ते पि॑तो। प्र स्वा॒द्मानो॒ रसा॑नां तुवि॒ग्रीवा॑ इवेरते ॥

तव॑ । त्ये । पि॒तो॒ इति॑ । दद॑तः । तव॑ । स्वा॒दि॒ष्ठ॒ । ते । पि॒तो॒ इति॑ । प्र । स्वा॒द्मानः॑ । रसा॑नाम् । तु॒वि॒ग्रीवाः॑ऽइव । ई॒र॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो। प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवा इवेरते ॥

तव। त्ये। पितो इति। ददतः। तव। स्वादिष्ठ। ते। पितो इति। प्र। स्वाद्मानः। रसानाम्। तुविग्रीवाःऽइव। ईरते ॥ १.१८७.५

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (पितो) अन्नव्यापी पालक परमात्मन् ! (ददतः) देते हुए (तव) आपके जो अन्न वा (त्ये) वे पूर्वोक्त रस हैं। हे (स्वादिष्ठ) अतीव स्वादुयुक्त (पितो) पालक अन्नव्यापक परमात्मन् (तव) आपके उस अन्न के सहित (ते) वे रस (रसानाम्) मधुरादि रसों के बीच (स्वाद्मानः) अतीवस्वादु (तुविग्रीवाइव) जिनका प्रबल गला उन जीवों के समान (प्रेरते) प्रेरणा देते अर्थात् जीवों को प्रीति उत्पन्न कराते हैं ॥ ५ ॥
Essence
सब पदार्थों में व्याप्त परमात्मा ही सभों के लिये अन्नादि पदार्थों को अच्छे प्रकार देता है और उसके किये हुए ही पदार्थ अपने गुणों के अनुकूल कोई अतीव स्वादु और कोई अतीव स्वादुतर हैं, यह सबको जानना चाहिये ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।