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Rigveda Mandal 1 / Sukta 187 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/187/2
Devata- ओषधयः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्वादो॑ पितो॒ मधो॑ पितो व॒यं त्वा॑ ववृमहे। अ॒स्माक॑मवि॒ता भ॑व ॥

स्वादो॒ इति॑ । पितो॒ इति॑ । मधो॒ इति॑ । पि॒तो॒ इति॑ । व॒यम् । त्वा॒ । व॒वृ॒म॒हे॒ । अ॒स्माक॑म् । अ॒वि॒ता । भ॒व॒ ॥

Mantra without Swara
स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे। अस्माकमविता भव ॥

स्वादो इति। पितो इति। मधो इति। पितो इति। वयम्। त्वा। ववृमहे। अस्माकम्। अविता। भव ॥ १.१८७.२

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 2

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Meaning
हे परमात्मन् ! आपके रचे (स्वादो) स्वादु (पितो) पीने योग्य जल तथा (मधो) मधुर (पितो) पालना करनेवाले (त्वा) उस अन्न को (वयम्) हम लोग (ववृमहे) स्वीकार करते हैं इससे आप उस अन्नपान के दान से (अस्माकम्) हमारी (अविता) रक्षा करनेवाले (भव) हूजिये ॥ २ ॥
Essence
मनुष्यों को मधुरादि रस के योग से स्वादिष्ठ अन्न और व्यञ्जन को आयुर्वेद की रीति से बनाकर सदा भोजन करना चाहिये, जो रोग को नष्ट करने से आयुर्दा बढ़ाने से रक्षा करनेवाला हो ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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