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Rigveda Mandal 1 / Sukta 186 / Mantra 6

191 Sukta
11 Mantra
1/186/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒त न॑ ईं॒ त्वष्टा ग॒न्त्वच्छा॒ स्मत्सू॒रिभि॑रभिपि॒त्वे स॒जोषा॑:। आ वृ॑त्र॒हेन्द्र॑श्चर्षणि॒प्रास्तु॒विष्ट॑मो न॒रां न॑ इ॒ह ग॑म्याः ॥

उ॒त । नः॒ । ई॒म् । त्वष्टा॑ । आ । ग॒न्तु॒ । अच्छ॑ । स्मत् । सू॒रिऽभिः॑ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वे । स॒ऽजोषाः॑ । आ । वृ॒त्र॒ऽहा । इन्द्रः॑ । च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः । तु॒विःऽत॑मः । न॒राम् । नः॒ । इ॒ह । ग॑म्याः ॥

Mantra without Swara
उत न ईं त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषा:। आ वृत्रहेन्द्रश्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः ॥

उत। नः। ईम्। त्वष्टा। आ। गन्तु। अच्छ। स्मत्। सूरिऽभिः। अभिऽपित्वे। सऽजोषाः। आ। वृत्रऽहा। इन्द्रः। चर्षणिऽप्राः। तुविःऽतमः। नराम्। नः। इह। गम्याः ॥ १.१८६.६

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जैसे (इह) यहाँ (वृत्रहा) मेघ का हननेवाला (चर्षणिप्राः) मनुष्यों को सुखों से पूर्ण करनेवाला (तुविष्टमः) अतीव बली (त्वष्टा) प्रकाशमान (इन्द्रः) सूर्य (ईम्) जल को वर्षाता है वैसे तुम (नराम्) सब मनुष्यों के बीच (नः) हम लोगों को (आ, गम्याः) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ (उत) और (स्मत्) प्रशंसायुक्त (अभिपित्वे) सब ओर से पाने योग्य व्यवहार में (सजोषाः) समान प्रीति रखनेवाले आप (सूरिभिः) विद्वानों के साथ (नः) हम लोगों के प्रति (अच्छ, आ, गन्तु) अच्छे प्रकार आइये ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान विद्या का प्रकाश कराते हैं, और अपने आत्मा के तुल्य सबको मान सुखी करते हैं, वे बलवान् होते हैं ॥ ६ ॥
Subject
अब मेघ और सूर्य के दृष्टान्त से उक्त विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।