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Rigveda Mandal 1 / Sukta 186 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/186/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उप॑ व॒ एषे॒ नम॑सा जिगी॒षोषासा॒नक्ता॑ सु॒दुघे॑व धे॒नुः। स॒मा॒ने अह॑न्वि॒मिमा॑नो अ॒र्कं विषु॑रूपे॒ पय॑सि॒ सस्मि॒न्नूध॑न् ॥

उप॑ । वः॒ । आ । इ॒षे॒ । नम॑सा । जि॒गी॒षा । उ॒षसा॒नक्ता॑ । सु॒दुघा॑ऽइव । धे॒नुः । स॒मा॒ने । अह॑न् । वि॒ऽमिमा॑नः । अ॒र्कम् । विषु॑ऽरूपे । पय॑सि । सस्मि॑न् । ऊध॑न् ॥

Mantra without Swara
उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः। समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन् ॥

उप। वः। आ। इषे। नमसा। जिगीषा। उषसानक्ता। सुदुघाऽइव। धेनुः। समाने। अहन्। विऽमिमानः। अर्कम्। विषुऽरूपे। पयसि। सस्मिन्। ऊधन् ॥ १.१८६.४

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 4

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Meaning
(समाने) एकसे (अहन्) दिन में (अर्कम्) सत्कार करने योग्य अन्न को (विमिमानः) विशेषता से बनानेवाला मैं (उषासानक्ता) दिन-रात्रि के समान वा (धेनुः) वाणी जो (सुदुघेव) सुन्दर कामना पूरण करनेवाली उसके समान (नमसा) अन्नादि पदार्थ से (जिगीषा) जीतने की इच्छा जैसे हो वैसे (विषुरूपे) नाना प्रकार के रूपवाले (पयसि) जल और (सस्मिन्) समान (ऊधन्) दूध के निमित्त (वः) तुम लोगों के (उप, आ, ईषे) समीप सब ओर से प्राप्त होता हूँ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो रात्रि-दिवस के समान वर्त्तमान विद्या-अविद्या को जानकर, सब समय में उद्योग कर, धेनु के समान प्राणियों का उपकार कर, दुष्टों को जीतते, वे दूध में घी के तुल्य संसार में सारभूत होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
अब विद्या को पाकर उद्योग करने के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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