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Rigveda Mandal 1 / Sukta 186 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/186/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॒ विश्व॒ आस्क्रा॑ गमन्तु दे॒वा मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णः स॒जोषा॑:। भुव॒न्यथा॑ नो॒ विश्वे॑ वृ॒धास॒: कर॑न्त्सु॒षाहा॑ विथु॒रं न शव॑: ॥

आ । नः॒ । विश्वे॑ । आस्क्राः॑ । ग॒म॒न्तु॒ । दे॒वाः । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । वरु॑णः । स॒ऽजोषाः॑ । भुव॑न् । यथा॑ । नः॒ । विश्वे॑ । वृ॒धासः॑ । कर॑न् । सु॒ऽसहा॑ । वि॒थु॒रम् । न । शवः॑ ॥

Mantra without Swara
आ नो विश्व आस्क्रा गमन्तु देवा मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषा:। भुवन्यथा नो विश्वे वृधास: करन्त्सुषाहा विथुरं न शव: ॥

आ। नः। विश्वे। आस्क्राः। गमन्तु। देवाः। मित्रः। अर्यमा। वरुणः। सऽजोषाः। भुवन्। यथा। नः। विश्वे। वृधासः। करन्। सुऽसहा। विथुरम्। न। शवः ॥ १.१८६.२

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! वैसे (मित्रः) प्राण के समान वर्त्तमान (अर्य्यमा) न्यायकारी (वरुणः) अतिश्रेष्ठ (सजोषाः) समान प्रीति का सेवन रखनेवाला और (आस्क्राः) शत्रुबल को पादाक्रान्त करने पाद तले दवानेवाले (विश्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् जन (नः) हम लोगों को (आ, गमन्तु) सब ओर से प्राप्त होवें कि (यथा) जैसे (विश्वे) समस्त वे विद्वान् (नः) हमारा (वृधासः) सुख बढ़ानेवाले (भुवन्) होवें और (सुषाहा) सुन्दर जिसका सहन क्षमा शान्तिपन वह जन (विथुरम्) व्यथा पीड़ा देते हुए पदार्थ के (न) समान शीघ्र (शवः) बल (करन्) करें ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस मार्ग से विद्वान् जन चलें, उसीसे सर्व लोग चलें। जैसे आप्त शास्त्रज्ञ विद्वान् जन औरों के सुख-दुःखों को अपने तुल्य जानते हैं, वैसे ही सबको होना चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।