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Rigveda Mandal 1 / Sukta 185 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/185/7
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒र्वी पृ॒थ्वी ब॑हु॒ले दू॒रेअ॑न्ते॒ उप॑ ब्रुवे॒ नम॑सा य॒ज्ञे अ॒स्मिन्। द॒धाते॒ ये सु॒भगे॑ सु॒प्रतू॑र्ती॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त् ॥

उ॒र्वी इति॑ । पृ॒थ्वी इति॑ । ब॒हु॒ले इति॑ । दू॒रेअ॑न्ते॒ इति॑ दू॒रेऽअ॑न्ते । उप॑ । ब्रु॒वे॒ । नम॑सा । य॒ज्ञे । अ॒स्मिन् । द॒धाते॒ इति॑ । ये इति॑ । सु॒भगे॒ इति॑ सु॒ऽभगे॑ । सु॒प्रतू॑र्ती॒ इति॑ सु॒ऽप्रतू॑र्ती । द्यावा॑ । रक्ष॑तम् । पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । नः॒ । अभ्वा॑त्॥

Mantra without Swara
उर्वी पृथ्वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन्। दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥

उर्वी इति। पृथ्वी इति। बहुले इति। दूरेअन्ते इति दूरेऽअन्ते। उप। ब्रुवे। नमसा। यज्ञे। अस्मिन्। दधाते इति। ये इति। सुभगे इति सुऽभगे। सुप्रतूर्ती इति सुऽप्रतूर्ती। द्यावा। रक्षतम्। पृथिवी इति। नः। अभ्वात् ॥ १.१८५.७

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 3 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(दूरेअन्ते) दूर में और समीप में (बहुले) बहुत वस्तुओं को ग्रहण करनेवाली (उर्वी) बहुत पदार्थयुक्त (पृथ्वी) बड़ी आकाश और पृथिवी का (अस्मिन्) इस संसार के व्यवहार (यज्ञे) जो कि सङ्ग करने योग्य उसमें (नमसा) अन्न के साथ मैं (उप, ब्रुवे) उपदेश करता हूँ और (ये) जो (सुभगे) सुन्दर ऐश्वर्य की प्राप्ति करनेवाली (सुप्रतूर्त्ती) अतिशीघ्र गतियुक्त आकाश और पृथिवी (दधाते) समस्त पदार्थों को धारण करते हैं उन (द्यावापृथिवी) आकाश और पृथिवी के समान वर्त्तमान माता-पिताओ ! (नः) हमको (अभ्वात्) अपराध से (रक्षतम्) बचाओ ॥ ७ ॥
Essence
जैसे पृथिवी के समीप में चन्द्रलोक की भूमि है वैसे सूर्य लोकस्थ भूमि दूर में है, ऐसे सब जगह प्रकाश और अन्धकाररूप लोकद्वय वर्त्तमान है, उन लोकों से जैसे उन्नति हो वैसा यत्न सबको करना चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।