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Rigveda Mandal 1 / Sukta 185 / Mantra 6

191 Sukta
11 Mantra
1/185/6
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒र्वी सद्म॑नी बृह॒ती ऋ॒तेन॑ हु॒वे दे॒वाना॒मव॑सा॒ जनि॑त्री। द॒धाते॒ ये अ॒मृतं॑ सु॒प्रती॑के॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त् ॥

उ॒र्वी इति॑ । सद्म॑नी॒ इति॑ । बृ॒ह॒ती इति॑ । ऋ॒तेन॑ । हु॒वे । दे॒वाना॑म् । अव॑सा । जनि॑त्री॒ इति॑ । द॒धाते॑ । ये । अ॒मृत॑म् । सु॒प्रती॑के॒ इति॑ सु॒ऽप्रती॑के । द्यावा॑ । रक्ष॑तम् । पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । नः॒ । अभ्वा॑त् ॥

Mantra without Swara
उर्वी सद्मनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री। दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥

उर्वी इति। सद्मनी इति। बृहती इति। ऋतेन। हुवे। देवानाम्। अवसा। जनित्री इति। दधाते। ये। अमृतम्। सुप्रतीके इति सुऽप्रतीके। द्यावा। रक्षतम्। पृथिवी इति। नः। अभ्वात् ॥ १.१८५.६

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे माता-पिताओ ! (ये) जो (उर्वी) बहुत विस्तारवाली (सद्मनी) सबकी निवासस्थान (बृहती) बड़ी (ऋतेन) जल से और (अवसा) रक्षा आदि के साथ (देवानाम्) विद्वानों की (जनित्री) उत्पन्न करनेवाली (सुप्रतीके) सुन्दर प्रतीति का विषय (द्यावा, पृथिवी) आकाश और पृथिवी (अमृतम्) जल को (दधाते) धारण करती हैं और मैं उनकी (हुवे) प्रशंसा करता हूँ वैसे (अभ्वात्) अपराध से (नः) हम लोगों की तुम (रक्षतम्) रक्षा करो ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता-पिता सत्योपदेश से सूर्य के समान विद्या प्रकाश से युक्त सर्वगुण सम्भृत पृथिवी जैसे जल से वृक्षों को वैसे शारीरिक बल से बढ़ाते हैं, वे सबकी रक्षा करने को योग्य हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।