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Rigveda Mandal 1 / Sukta 185 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/185/4
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अत॑प्यमाने॒ अव॒साव॑न्ती॒ अनु॑ ष्याम॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे। उ॒भे दे॒वाना॑मु॒भये॑भि॒रह्नां॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त् ॥

अत॑प्यमाने॒ इति॑ । अव॑सा । अव॑न्ती॒ इति॑ । अनु॑ । स्या॒म॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । दे॒वपु॑त्रे॒ इति॑ दे॒वऽपु॑त्रे । उ॒भे इति॑ । दे॒वाना॑म् । उ॒भये॑भिः । अह्ना॑म् । द्यावा॑ । रक्ष॑तम् । पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । नः॒ । अभ्वा॑त् ॥

Mantra without Swara
अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे। उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥

अतप्यमाने इति। अवसा। अवन्ती इति। अनु। स्याम। रोदसी इति। देवपुत्रे इति देवऽपुत्रे। उभे इति। देवानाम्। उभयेभिः। अह्नाम्। द्यावा। रक्षतम्। पृथिवी इति। नः। अभ्वात् ॥ १.१८५.४

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (अतप्यमाने) सन्तापरहित (अवसा) रक्षा आदि से (अवन्ती) रक्षा करती हुई (देवपुत्रे) देव जो परमात्मा उसके पुत्र के समान वर्त्तमान (उभे) दोनों (रोदसी) प्रकाशभूमि (अह्नाम्) दिनों के बीच (उभयेभिः) स्थावर और जङ्गमों के साथ (देवानाम्) दिव्य जलादि पदार्थों के जीवन रक्षा करते हैं वैसे हे (द्यावा, पृथिवी) आकाश और पृथिवी के समान वर्त्तमान माता-पिताओ ! तुम दोनों (अभ्वात्) अपराध से (नः) हमारी (रक्षतम्) रक्षा कीजिये जिससे हम लोग (अनु, स्याम) पीछे सुखी होवें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी आदि पदार्थ समस्त स्थावर जङ्गम की पालना करते हैं, वैसे माता, पिता, आचार्य्य और राजा आदि प्रजा की रक्षा करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर दृष्टान्तप्राप्त द्यावापृथिवी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।