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Rigveda Mandal 1 / Sukta 185 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/185/10
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तं दि॒वे तद॑वोचं पृथि॒व्या अ॑भिश्रा॒वाय॑ प्रथ॒मं सु॑मे॒धाः। पा॒ताम॑व॒द्याद्दु॑रि॒ताद॒भीके॑ पि॒ता मा॒ता च॑ रक्षता॒मवो॑भिः ॥

ऋ॒तम् । दि॒वे । तत् । अ॒वो॒च॒म् । पृ॒थि॒व्यै । अ॒भि॒ऽश्रा॒वाय॑ । प्र॒थ॒मम् । सु॒ऽमे॒धाः । पा॒ताम् । अ॒व॒द्यात् । दुः॒ऽइ॒तात् । अ॒भीके॑ । पि॒ता । मा॒ता । च॒ । र॒क्ष॒ता॒म् । अवः॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः। पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः ॥

ऋतम्। दिवे। तत्। अवोचम्। पृथिव्यै। अभिऽश्रावाय। प्रथमम्। सुऽमेधाः। पाताम्। अवद्यात्। दुःऽइतात्। अभीके। पिता। माता। च। रक्षताम्। अवःऽभिः ॥ १.१८५.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 3 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (सुमेधाः) सुन्दर बुद्धिवाला मैं (अभिश्रावाय) जो सब ओर से सुनता वा सुनाता उसके लिये और (पृथिव्यै) पृथिवी के समान वर्त्तमान क्षमाशील स्त्री के लिये जो (प्रथमम्) प्रथम (ऋतम्) सत्य (अवोचम्) उपदेश करूँ और कहूँ (तत्) उसको (दिवे) दिव्य उत्तमवाले के लिये भी उपदेश करूँ कहूँ जैसे (अभीके) कामना किये हुए व्यवहार में वर्त्तमान (अवद्यात्) निन्दा योग्य (दुरितात्) दुष्ट आचरण से उक्त दोनों (पाताम्) रक्षा करें वैसे (पिता) पिता (च) और (माता) माता (अवोभिः) रक्षा आदि व्यवहारों से मेरी (रक्षताम्) रक्षा करें ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उपदेश करनेवाले को उपदेश सुनने योग्यों के प्रति ऐसा कहना चाहिये कि जैसा प्रिय लोकहितकारी वचन मुझसे कहा जावे, वैसे आप लोगों को भी कहना चाहिये, जैसे माता-पिता अपने सन्तानों की सेवा करते हैं, वैसे ये सन्तानों को भी सदा सेवने योग्य हैं ॥ १० ॥
Subject
चलते हुए विषय में चाहे हुए कहने योग्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।