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Rigveda Mandal 1 / Sukta 184 / Mantra 6

191 Sukta
6 Mantra
1/184/6
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अता॑रिष्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्य प्रति॑ वां॒ स्तोमो॑ अश्विनावधायि। एह या॑तं प॒थिभि॑र्देव॒यानै॑र्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥

अता॑रिष्म । तम॑सः । पा॒रम् । अ॒स्य । प्रति॑ । वा॒म् । स्तोमः॑ । अ॒श्वि॒नौ॒ । अ॒धा॒यि॒ । आ । इ॒ह । या॒त॒म् । प॒थिऽभिः॑ । दे॒व॒ऽयानैः॑ । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥

Mantra without Swara
अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्विनावधायि। एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

अतारिष्म। तमसः। पारम्। अस्य। प्रति। वाम्। स्तोमः। अश्विनौ। अधायि। आ। इह। यातम्। पथिऽभिः। देवऽयानैः। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१८४.६

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 6

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Meaning
हे (अश्विनौ) विशेष उपदेश देनेवाले ! (इह) इस जानने योग्य व्यवहार में जो (स्तोमः) प्रशंसा (वाम्) तुम दोनों के (प्रति) प्रति (अधायि) धारण की गई उससे (अस्य) इस (तमसः) अविद्यान्धकार के (पारम्) पार को (अतारिष्म) पहुँचें जैसे तुम (देवयानैः) आप्त विद्वान् जिन में जाते हैं उन (पथिभिः) मार्गों से (इषम्) इष्ट सुख (वृजनम्) शारीरिक और आत्मिक बल तथा (जीरदानुम्) जीवात्मा को (आ, यातम्) प्राप्त होओ वैसे इसको हम भी (विद्याम) प्राप्त होवें ॥ ६ ॥
Essence
वे ही विद्या के परमपार मनुष्यों को पहुँचा सकते हैं, जो धर्म मार्ग से ही चलते हैं और यथार्थ के उपदेशक भी हैं ॥ ६ ॥ इस सूक्त में अध्यापक और उपदेशकों के लक्षणों को कहने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥यह एकसौ चौरासीवाँ सूक्त और प्रथम वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर अध्यापकोपदेशक विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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