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Rigveda Mandal 1 / Sukta 184 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/184/5
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒ष वां॒ स्तोमो॑ अश्विनावकारि॒ माने॑भिर्मघवाना सुवृ॒क्ति। या॒तं व॒र्तिस्तन॑याय॒ त्मने॑ चा॒गस्त्ये॑ नासत्या॒ मद॑न्ता ॥

ए॒षः । वा॒म् । स्तोमः॑ । अ॒श्वि॒नौ॒ । अ॒का॒रि॒ । माने॑भिः । म॒घ॒ऽवा॒ना॒ । सु॒ऽवृ॒क्ति । या॒तम् । व॒र्तिः । तन॑याय । त्मने॑ । च॒ । अ॒गस्त्ये॑ । ना॒स॒त्या॒ । मद॑न्ता ॥

Mantra without Swara
एष वां स्तोमो अश्विनावकारि मानेभिर्मघवाना सुवृक्ति। यातं वर्तिस्तनयाय त्मने चागस्त्ये नासत्या मदन्ता ॥

एषः। वाम्। स्तोमः। अश्विनौ। अकारि। मानेभिः। मघऽवाना। सुऽवृक्ति। यातम्। वर्तिः। तनयाय। त्मने। च। अगस्त्ये। नासत्या। मदन्ता ॥ १.१८४.५

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवाना) परमपूजित अध्यापकोपदेशको ! (एषः) यह (वाम्) तुम दोनों की (स्तोमः) प्रशंसा (मानेभिः) जो मानते हैं उन्होंने (सुवृक्ति) सुन्दर त्याग जैसे हो वैसे (अकारि) की है अर्थात् कुछ मुखदेखी मिथ्या प्रशंसा नहीं की। और हे (नासत्या) सत्य में निरन्तर स्थिर रहनेवाले (अश्विनौ) अध्यापक उपदेशक लोगो ! (अगस्त्ये) अपराधरहित मार्ग में (मदन्ता) शुभ कामना करते हुए तुम (तनयाय) उत्तम सन्तान और (त्मने, च) अपने लिये (वर्त्तिः) अच्छे मार्ग को (यातम्) प्राप्त होओ ॥ ५ ॥
Essence
वही स्तुति होती है, जिनको विद्वान् जन मानते हैं, वैसी ही परोपकार होता है, जैसा अपने सन्तान और अपने लिये चाहा जाता है और वही धर्ममार्ग हो कि जिसमें श्रेष्ठ धर्मात्मा विद्वान् जन चलते हैं ॥ ५ ॥
Subject
अब अध्यापक और उपदेशकों की प्रशंसा का विषय अगले मन्त्र में कहा है ।