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Rigveda Mandal 1 / Sukta 184 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/184/2
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्मे ऊ॒ षु वृ॑षणा मादयेथा॒मुत्प॒णीँर्ह॑तमू॒र्म्या मद॑न्ता। श्रु॒तं मे॒ अच्छो॑क्तिभिर्मती॒नामेष्टा॑ नरा॒ निचे॑तारा च॒ कर्णै॑: ॥

अ॒स्मे इति॑ । ऊँ॒ इति॑ । सु । वृ॒ष॒णा॒ । मा॒द॒ये॒था॒म् । उत् प॒णीन् । ह॒त॒म् । ऊ॒र्म्या । मद॑न्ता । श्रु॒तम् । मे॒ । अच्छो॑क्तिऽभिः । म॒ती॒नाम् । एष्टा॑ । न॒रा॒ । निऽचे॑तारा । च॒ । कर्णैः॑ ॥

Mantra without Swara
अस्मे ऊ षु वृषणा मादयेथामुत्पणीँर्हतमूर्म्या मदन्ता। श्रुतं मे अच्छोक्तिभिर्मतीनामेष्टा नरा निचेतारा च कर्णै: ॥

अस्मे इति। ऊँ इति। सु। वृषणा। मादयेथाम्। उत् पणीन्। हतम्। ऊर्म्या। मदन्ता। श्रुतम्। मे। अच्छोक्तिऽभिः। मतीनाम्। एष्टा। नरा। निऽचेतारा। च। कर्णैः ॥ १.१८४.२

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
(वृषणा) बलवान् (निचेतारा) नित्य ज्ञानवान् और ज्ञान के देनेवाले (नरा) अग्रगामी विद्वानो ! तुम (पणीन्) प्रशंसित व्यवहार करनेवाले (अस्मे) हम लोगों को (सु, मादयेथाम्) सुन्दरता से आनन्दित करो (ऊर्म्या) और रात्रि के साथ (मदन्ता) आनन्दित होते हुए तुम लोग दुष्टों का (उत्, हतम्) उद्धार करो अर्थात् उनको उस दुष्टता से बचाओ और (मतीनाम्) मनुष्यों की (अच्छोक्तिभिः) अच्छी उक्तियों अर्थात् सुन्दर वचनों से जो मैं (एष्टा) विवेक करनेवाला हूँ उस (च, मे) मेरी भी सुन्दर उक्ति को (कर्णैः) कानों से (उ, श्रुतम्) तर्क-वितर्क करने के साथ सुनो ॥ २ ॥
Essence
जैसे अध्यापक और उपदेश करनेवाले जन पढ़ाने और उपदेश सुनाने योग्य पुरुषों को वेदवचनों से अच्छे प्रकार ज्ञान देकर विद्वान् करते हैं, वैसे उनके वचन को सुनके वे सब काल में सबको आनन्दित करने योग्य हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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