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Rigveda Mandal 1 / Sukta 182 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/182/6
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अव॑विद्धं तौ॒ग्र्यम॒प्स्व१॒॑न्तर॑नारम्भ॒णे तम॑सि॒ प्रवि॑द्धम्। चत॑स्रो॒ नावो॒ जठ॑लस्य॒ जुष्टा॒ उद॒श्विभ्या॑मिषि॒ताः पा॑रयन्ति ॥

अव॑ऽविद्धम् । तौ॒ग्र्यम् । अ॒प्ऽसु । अ॒न्तः । अ॒ना॒र॒म्भ॒णे । तम॑सि । प्रऽवि॑द्धम् । चत॑स्रः । नावः॑ । जठ॑लस्य । जुष्टाः॑ । उत् । अ॒श्विऽभ्या॑म् । इ॒षि॒ताः । पा॒र॒य॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
अवविद्धं तौग्र्यमप्स्व१न्तरनारम्भणे तमसि प्रविद्धम्। चतस्रो नावो जठलस्य जुष्टा उदश्विभ्यामिषिताः पारयन्ति ॥

अवऽविद्धम्। तौग्र्यम्। अप्ऽसु। अन्तः। अनारम्भणे। तमसि। प्रऽविद्धम्। चतस्रः। नावः। जठलस्य। जुष्टाः। उत्। अश्विऽभ्याम्। इषिताः। पारयन्ति ॥ १.१८२.६

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 28 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (अश्विभ्याम्) वायु और अग्नि से (इषिताः) प्रेरणा दी हुई अर्थात् पवन और अग्नि के बल से चली हुई एक एक चौतरफी (चतस्रः) चार चार (नावः) नावें (जठलस्य) उदर के समान समुद्र में (जुष्टाः) की हुई (अनारम्भणे) जिसका अविद्यमान आरम्भण उस (तमसि) अन्धकार में (प्रविद्धम्) अच्छे प्रकार व्यथित (अप्सु) जलों के (अन्तः) भीतर (अवविद्धम्) विशेष पीड़ा पाये हुए (तौग्र्यम्) बल को ग्रहण करनेवालों में प्रसिद्ध जन को (उत्पारयन्ति) उत्तमता से पार पहुँचाती हैं, वे विद्वानों को बनानी चाहिये ॥ ६ ॥
Essence
मनुष्य जब नौका में बैठके समुद्र के मार्ग से जाने की इच्छा करें, तब बड़ी नाव के साथ छोटी नावें जोड़ समुद्र में जाना-आना करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर नौकादि यान विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।