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Rigveda Mandal 1 / Sukta 182 / Mantra 2

191 Sukta
8 Mantra
1/182/2
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॑तमा॒ हि धिष्ण्या॑ म॒रुत्त॑मा द॒स्रा दंसि॑ष्ठा र॒थ्या॑ र॒थीत॑मा। पू॒र्णं रथं॑ वहेथे॒ मध्व॒ आचि॑तं॒ तेन॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ याथो अश्विना ॥

इन्द्र॑ऽतमा । हि । धिष्ण्या॑ । म॒रुत्ऽत॑मा । द॒स्रा । दंसि॑ष्ठा । र॒थ्या॑ । र॒थिऽत॑मा । पू॒र्णम् । रथ॑म् । व॒हे॒थे॒ इति॑ । मध्वः॑ । आचि॑तम् । तेन॑ । दा॒श्वांस॑म् । उप॑ । या॒थः॒ । अ॒श्वि॒ना॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रतमा हि धिष्ण्या मरुत्तमा दस्रा दंसिष्ठा रथ्या रथीतमा। पूर्णं रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्वांसमुप याथो अश्विना ॥

इन्द्रऽतमा। हि। धिष्ण्या। मरुत्ऽतमा। दस्रा। दंसिष्ठा। रथ्या। रथिऽतमा। पूर्णम्। रथम्। वहेथे इति। मध्वः। आचितम्। तेन। दाश्वांसम्। उप। याथः। अश्विना ॥ १.१८२.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 27 Mantra » 2

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Meaning
हे (अश्विना) अध्यापकोपदेशक जनो ! (हि) तुम्हीं (इन्द्रतमा) अतीव ऐश्वर्य्ययुक्त (धिष्ण्या) प्रगल्भ (मरुत्तमा) अत्यन्त विद्वानों को साथ लिये हुए (दस्रा) दुःख के दूर करनेवाले (दंसिष्ठा) अतीव पराक्रमी (रथ्या) रथ चलाने में श्रेष्ठ और (रथीतमा) प्रशंसित पराक्रमयुक्त हों और (मध्वः) मधु से (आचितम्) भरे हुए (पूर्णम्) शस्त्र और अस्त्रों से परिपूर्ण जिस (रथम्) रथ को (वहेथे) प्राप्त होते हो (तेन) और उससे (दाश्वांसम्) विद्या देनेवाले जन के (उप, याथः) समीप जाते हो वे हम लोगों को नित्य सत्कार करने योग्य हों ॥ २ ॥
Essence
जो बिजुली, अग्नि, जल और वायु इनसे चलाये हुए रथ पर स्थित हो देशदेशान्तर को जाते हैं, वे परिपूर्ण धन जीतनेवाले होते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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