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Rigveda Mandal 1 / Sukta 181 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/181/6
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वां॑ श॒रद्वा॑न्वृष॒भो न नि॒ष्षाट् पू॒र्वीरिष॑श्चरति॒ मध्व॑ इ॒ष्णन्। एवै॑र॒न्यस्य॑ पी॒पय॑न्त॒ वाजै॒र्वेष॑न्तीरू॒र्ध्वा न॒द्यो॑ न॒ आगु॑: ॥

प्र । वा॒म् । श॒रत्ऽवा॑न् । वृ॒ष॒भः । न । नि॒ष्षाट् । पू॒र्वीः । इषः॑ । च॒र॒ति॒ । मध्वः॑ । इ॒ष्णन् । एवैः॑ । अ॒न्यस्य॑ । पी॒पय॑न्त । वाजैः॑ । वेष॑न्तीः । ऊ॒र्ध्वाः । न॒द्यः॑ । नः॒ । आ । अ॒गुः॒ ॥

Mantra without Swara
प्र वां शरद्वान्वृषभो न निष्षाट् पूर्वीरिषश्चरति मध्व इष्णन्। एवैरन्यस्य पीपयन्त वाजैर्वेषन्तीरूर्ध्वा नद्यो न आगु: ॥

प्र। वाम्। शरत्ऽवान्। वृषभः। न। निष्षाट्। पूर्वीः। इषः। चरति। मध्वः। इष्णन्। एवैः। अन्यस्य। पीपयन्त। वाजैः। वेषन्तीः। ऊर्ध्वाः। नद्यः। नः। आ। अगुः ॥ १.१८१.६

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 26 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापकोपदेशक जनो ! जैसे (वाम्) तुम्हारा (शरद्वान्) शरद् जो ऋतुएँ वे जिनमें विद्यमान वह (वृषभः) वर्षा करानेवाला जो सूर्य्यमण्डल उसके (न) समान (निष्षाट्) निरन्तर सहनशील जन (पूर्वीः) अगले समय में प्राप्त हुई प्रजा (इषः) और जानने योग्य प्रजा जनों को (चरति) प्राप्त होता है वा (मध्वः) मधुर पदार्थों को (इष्णन्) चाहता हुआ (एवैः) प्राप्ति करानेवाले पदार्थों से (अन्यस्य) दूसरे की पिछली वा जानने योग्य अगली प्रजाओं को प्राप्त होता है वैसे (वाजैः) वेगों के साथ वर्त्तमान (ऊर्द्ध्वाः) ऊपर को जानेवाली लपटें वा (वेषन्तीः) इधर-उधर व्याप्त होनेवाली (नद्यः) नदियाँ (नः) हम लोगों को (प्र, पीपयन्त) वृद्धि दिलाती हैं और (आगुः) प्राप्त होती हैं ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो आप्त अध्यापक और उपदेशकों से विद्याओं को प्राप्त होके औरों को देते हैं, वे अग्नि के तुल्य तेजस्वी शुद्ध होकर सब ओर से वर्त्तमान हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।