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Rigveda Mandal 1 / Sukta 180 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/180/9
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र यद्वहे॑थे महि॒ना रथ॑स्य॒ प्र स्प॑न्द्रा याथो॒ मनु॑षो॒ न होता॑। ध॒त्तं सू॒रिभ्य॑ उ॒त वा॒ स्वश्व्यं॒ नास॑त्या रयि॒षाच॑: स्याम ॥

प्र । यत् । वहे॑थे॒ इति॑ । म॒हि॒ना । रथ॑स्य । प्र । स्य॒न्द्रा॒ । या॒थः॒ । मनु॑षः । न । होता॑ । ध॒त्तम् । सू॒रिऽभ्यः॑ । उ॒त । वा॒ । सु॒ऽअश्व्य॑म् । नास॑त्या । र॒यि॒ऽसाचः॑ । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
प्र यद्वहेथे महिना रथस्य प्र स्पन्द्रा याथो मनुषो न होता। धत्तं सूरिभ्य उत वा स्वश्व्यं नासत्या रयिषाच: स्याम ॥

प्र। यत्। वहेथे इति। महिना। रथस्य। प्र। स्पन्द्रा। याथः। मनुषः। न। होता। धत्तम्। सूरिऽभ्यः। उत। वा। सुऽअश्व्यम्। नासत्या। रयिऽसाचः। स्याम ॥ १.१८०.९

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्पन्द्रा) उत्तम चाल चलने और (नासत्या) सत्य स्वभावयुक्त स्त्री-पुरुषो ! (यत्) जो तुम (होता) दान करनेवाले (मनुषः) मनुष्य के (न) समान (महिना) बड़प्पन के साथ (रथस्य) रमण करने योग्य विमानादि रथ को (प्रवहेथे) प्राप्त होते और (प्रयाथः) एक देश से दूसरे देश पहुँचाते हो वे आप (सूरिभ्यः) विद्वानों के लिये धन को (धत्तम्) धारण करो (उत, वा) अथवा (स्वश्व्यम्) सुन्दर घोड़ा जिसमें विराजमान उत्तम धनादि विभव को प्राप्त होओ जिससे हम लोग (रयिषाचः) धन के साथ सम्बन्ध करनेवाले (स्याम) हों ॥ ९ ॥
Essence
मनुष्य जैसे अपने सुख के लिये जिन साधनों की इच्छा करें उन्हीं को औरों के आनन्द के लिये चाहें। जो सुपात्र पढ़ानेवालों को धनदान देते हैं, वे श्रीमान् धनवान् होते हैं ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।