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Rigveda Mandal 1 / Sukta 180 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/180/8
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वां चि॒द्धि ष्मा॑श्विना॒वनु॒ द्यून्विरु॑द्रस्य प्र॒स्रव॑णस्य सा॒तौ। अ॒गस्त्यो॑ न॒रां नृषु॒ प्रश॑स्त॒: कारा॑धुनीव चितयत्स॒हस्रै॑: ॥

यु॒वाम् । चि॒त् । हि । स्म॒ । अ॒श्वि॒नौ॒ । अनु॑ । द्यून् । विऽरु॑द्रस्य । प्र॒ऽस्रव॑णस्य । सा॒तौ । अ॒गस्त्यः॑ । न॒राम् । नृषु॑ । प्रऽश॑स्तः । कारा॑धुनीऽइव । चि॒त॒य॒त् । स॒हस्रैः॑ ॥

Mantra without Swara
युवां चिद्धि ष्माश्विनावनु द्यून्विरुद्रस्य प्रस्रवणस्य सातौ। अगस्त्यो नरां नृषु प्रशस्त: काराधुनीव चितयत्सहस्रै: ॥

युवाम्। चित्। हि। स्म। अश्विनौ। अनु। द्यून्। विऽरुद्रस्य। प्रऽस्रवणस्य। सातौ। अगस्त्यः। नराम्। नृषु। प्रऽशस्तः। काराधुनीऽइव। चितयत्। सहस्रैः ॥ १.१८०.८

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विनौ) सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य गुणवाले स्त्री-पुरुषो ! जैसे (युवां, चित्) तुम ही (हि, स्म) जिस कारण (विरुद्रस्य) विविध प्रकार से प्राण विद्यमान उस (प्रस्रवणस्य) उत्तमता से जानेवाले शरीर की (सातौ) संभक्ति में (अनु, द्यून्) प्रतिदिन अपने सन्तानों को उपदेश देओ वैसे उसी कारण (नराम्) मनुष्यों के बीच (नृषु) श्रेष्ठ मनुष्यों में (प्रशस्तः) उत्तम (अगस्त्यः) अपराध को दूर करनेवाला जन (सहस्रैः) हजारों प्रकार से (काराधुनीव) शब्दों को कंपाते हुए वादित्र आदि के समान सबको (चितयत्) उत्तम चितावे ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो स्त्रीपुरुष निरन्तर सूर्य और चन्द्रमा के समान सन्तानों की विद्या और उत्तम उपदेशों से प्रकाशित करते हैं, वे प्रशंसावान् होते हैं ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।