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Rigveda Mandal 1 / Sukta 180 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/180/7
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
व॒यं चि॒द्धि वां॑ जरि॒तार॑: स॒त्या वि॑प॒न्याम॑हे॒ वि प॒णिर्हि॒तावा॑न्। अधा॑ चि॒द्धि ष्मा॑श्विनावनिन्द्या पा॒थो हि ष्मा॑ वृषणा॒वन्ति॑देवम् ॥

व॒यम् । चि॒त् । हि । वा॒म् । ज॒रि॒तारः॑ । स॒त्याः । वि॒प॒न्याम॑हे । वि । प॒णिः । हि॒तऽवा॑न् । अध॑ । चि॒त् । हि । स्म॒ । अ॒श्वि॒नौ॒ । अ॒नि॒न्द्या॒ । पा॒थः । हि । स्म॒ । वृ॒ष॒णौ॒ । अन्ति॑ऽदेवम् ॥

Mantra without Swara
वयं चिद्धि वां जरितार: सत्या विपन्यामहे वि पणिर्हितावान्। अधा चिद्धि ष्माश्विनावनिन्द्या पाथो हि ष्मा वृषणावन्तिदेवम् ॥

वयम्। चित्। हि। वाम्। जरितारः। सत्याः। विपन्यामहे। वि। पणिः। हितऽवान्। अध। चित्। हि। स्म। अश्विनौ। अनिन्द्या। पाथः। हि। स्म। वृषणौ। अन्तिऽदेवम् ॥ १.१८०.७

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अनिन्द्या) निन्दा के न योग्य (वृषणौ) बलवान् (अश्विनौ) समस्त पदार्थ गुण व्यापी स्त्रीपुरुषो ! तुम जैसे (हितावान्) हित जिसके विद्यमान वह (विपणिः) विशेषतर व्यवहार करनेवाला जन (वाम्) तुम दोनों की प्रशंसा करता है वैसे हम लोग प्रशंसा करें। वा जैसे (चित्, हि) ही (जरितारः) स्तुति प्रशंसा करने और (सत्याः) सत्य व्यवहार वर्त्तनेवाले (वयम्) हम लोग तुम दोनों की (विपन्यामहे) उत्तम स्तुति करते हैं वैसे (स्म, हि) ही (अन्तिदेवम्) विद्वानों में विद्वान् जन की सेवा करें वा जैसे (हि, स्म) ही आश्चर्यरूप (पाथः) जल (चित्) निश्चय से तृप्ति करता है वैसे (अध) इसके अनन्तर विद्वानों का सत्कार करें ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्वान् जन प्रशंसा करने योग्यों की प्रशंसा करते और निन्दा करने योग्यों की निन्दा करते हैं, वैसे वर्त्ताव रक्खें ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।