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Rigveda Mandal 1 / Sukta 180 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/180/6
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नि यद्यु॒वेथे॑ नि॒युत॑: सुदानू॒ उप॑ स्व॒धाभि॑: सृजथ॒: पुरं॑धिम्। प्रेष॒द्वेष॒द्वातो॒ न सू॒रिरा म॒हे द॑दे सुव्र॒तो न वाज॑म् ॥

नि । यत् । यु॒वेथे॒ इति॑ । नि॒ऽयुतः॑ । सु॒दा॒नू॒ इति॑ सुऽदानू । उप॑ । स्व॒धाभिः॑ । सृ॒ज॒थः॒ । पुर॑म्ऽधिम् । प्रेष॑त् । वेष॑त् । वातः॑ । न । सू॒रिः । आ । म॒हे । द॒दे॒ । सु॒ऽव्र॒तः । न । वाज॑म् ॥

Mantra without Swara
नि यद्युवेथे नियुत: सुदानू उप स्वधाभि: सृजथ: पुरंधिम्। प्रेषद्वेषद्वातो न सूरिरा महे ददे सुव्रतो न वाजम् ॥

नि। यत्। युवेथे इति। निऽयुतः। सुदानू इति सुऽदानू। उप। स्वधाभिः। सृजथः। पुरम्ऽधिम्। प्रेषत्। वेषत्। वातः। न। सूरिः। आ। महे। ददे। सुऽव्रतः। न। वाजम् ॥ १.१८०.६

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 1

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Meaning
(यत्) जब हे (सुदानू) सुन्दर दानशील स्त्रीपुरुषो ! (नियुतः) पवन के वेगादि गुणों के समान निश्चित पदार्थों को (नियुवेथे) एक दूसरे से मिलाते हो तब (स्वधाभिः) अन्नादि पदार्थों से जिससे (पुरन्धिम्) प्राप्त होने योग्य विज्ञान को (उप, सृजथः) उत्पन्न करते हो वह (सूरिः) विद्वान् (प्रेषत्) प्रसन्न हो (वातः) पवन के (न) समान (वेषत्) सब ओर से गमन करे और (सुव्रतः) सुन्दर व्रत अर्थात् धर्म के अनुकूल नियमों से युक्त सज्जन पुरुष के (न) समान (महे) महत्त्व अर्थात् बड़प्पन के लिये (वाजम्) विशेष ज्ञान को (आददे) ग्रहण करता हूँ ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। पितादिकों को चाहिये कि शिल्पक्रिया की कुशलता को पुत्रादिकों में उत्पन्न करावें, शिक्षा को प्राप्त हुए पुत्रादि समस्त पदार्थों को विशेषता से जानें और कलायन्त्रों से चलाये हुए पवन के समान जिससे वेग उस यान से जहाँ-तहाँ चाहे हुए स्थान को जावें ॥ ६ ॥
Subject
अब सन्तानशिक्षापरक गार्हस्थ कर्म अगले मन्त्र में कहा है ।

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