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Rigveda Mandal 1 / Sukta 180 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/180/5
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वां॑ दा॒नाय॑ ववृतीय दस्रा॒ गोरोहे॑ण तौ॒ग्र्यो न जिव्रि॑:। अ॒पः क्षो॒णी स॑चते॒ माहि॑ना वां जू॒र्णो वा॒मक्षु॒रंह॑सो यजत्रा ॥

आ । वा॒म् । दा॒नाय॑ । व॒वृ॒ती॒य॒ । द॒स्रा॒ । गोः । ओहे॑न । तौ॒ग्र्यः । न । जिव्रिः॑ । अ॒पः । क्षो॒णी इति॑ । स॒च॒ते॒ । माहि॑ना । वा॒म् । जू॒र्णः । वा॒म् । अक्षुः॑ । अंह॑सः । य॒ज॒त्रा॒ ॥

Mantra without Swara
आ वां दानाय ववृतीय दस्रा गोरोहेण तौग्र्यो न जिव्रि:। अपः क्षोणी सचते माहिना वां जूर्णो वामक्षुरंहसो यजत्रा ॥

आ। वाम्। दानाय। ववृतीय। दस्रा। गोः। ओहेन। तौग्र्यः। न। जिव्रिः। अपः। क्षोणी इति। सचते। माहिना। वाम्। जूर्णः। वाम्। अक्षुः। अंहसः। यजत्रा ॥ १.१८०.५

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (दस्रा) दुःख दूर करने और (यजत्रा) सर्वव्यवहार की सङ्गति करानेवाले स्त्री-पुरुषो ! (जीव्रिः) जीर्णवृद्ध (तौग्र्यः) बलवानों में बली जन के (न) समान मैं (गोरोहेण) पृथिवी के बीज स्थापन से (वाम्) तुम दोनों को (दानाय) देने के लिये (आववृतीय) अच्छे वर्त्तूं जैसे (माहिना) बड़ी होने से (क्षोणी) भूमि (अपः) जलों का (सचते) सम्बन्ध करती है वैसे (जूर्णः) रोगवान् मैं (वाम्) तुम्हारा सम्बन्ध करूँ और (अक्षुः) व्याप्त होने को शीलस्वभाववाला मैं (अंहसः) दुष्टाचार से (वाम्) तुम दोनों को अलग रक्खूँ ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। विद्वान् जन स्त्री-पुरुषों के लिये ऐसा उपदेश करें कि जैसे हम लोग तुम्हारे लिये विद्यायें देवें, दुष्ट आचारों से अलग रक्खें वैसा तुमको भी आचरण करना चाहिये और पृथिवी के समान क्षमा तथा परोपकारादि कर्म करने चाहियें ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।