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Rigveda Mandal 1 / Sukta 180 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/180/4
Devata- अश्विनौ Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वं ह॑ घ॒र्मं मधु॑मन्त॒मत्र॑ये॒ऽपो न क्षोदो॑ऽवृणीतमे॒षे। तद्वां॑ नरावश्विना॒ पश्व॑इष्टी॒ रथ्ये॑व च॒क्रा प्रति॑ यन्ति॒ मध्व॑: ॥

यु॒वम् । ह॒ । घ॒र्मम् । मधु॑ऽमन्तम् । अत्र॑ये । अ॒पः । न । क्षोदः॑ । अ॒वृ॒णी॒त॒म् । ए॒षे । तत् । वा॒म् । न॒रौ॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । पश्वः॑ऽइष्टिः । रथ्या॑ऽइव । च॒क्रा । प्रति॑ । य॒न्ति॒ । मध्वः॑ ॥

Mantra without Swara
युवं ह घर्मं मधुमन्तमत्रयेऽपो न क्षोदोऽवृणीतमेषे। तद्वां नरावश्विना पश्वइष्टी रथ्येव चक्रा प्रति यन्ति मध्व: ॥

युवम्। ह। घर्मम्। मधुऽमन्तम्। अत्रये। अपः। न। क्षोदः। अवृणीतम्। एषे। तत्। वाम्। नरौ। अश्विना। पश्वःऽइष्टिः। रथ्याऽइव। चक्रा। प्रति। यन्ति। मध्वः ॥ १.१८०.४

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 4

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Meaning
हे (नरौ) नायक अग्रगन्ता (अश्विना) बिजुली आदि की विद्या में व्याप्त स्त्री-पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (एषे) सब ओर से इच्छा करते हुए (अत्रये) और भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान तीनों काल में जिसको दुःख नहीं ऐसे सर्वदा सुखयुक्त रहनेवाले पुरुष के लिये (मधुमन्तम्) मधुरादि गुणयुक्त (घर्मम्) दिन और (क्षोदः) जल को (अपः) प्राणों के (न) समान (अवृणीतम्) स्वीकार करो, जिस कारण (वाम्) तुम दोनों की (पश्वइष्टिः) पशुकुल की सङ्गति, (रथ्येव) रथों में उत्तम (चक्रा) पहियों के समान (मध्वः) मधुर फलों को (प्रति, यन्ति) प्रति प्राप्त होते हैं (तत्, ह) इस कारण प्राप्त होओ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यदि स्त्रीपुरुष गृहाश्रम में मधुरादि रसों से युक्त पदार्थों और उत्तम पशुओं को, रथ आदि यानों को प्राप्त होवें तो उनके सब दिन सुख से जावें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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