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Rigveda Mandal 1 / Sukta 18 / Mantra 7

191 Sukta
9 Mantra
1/18/7
Devata- सदसस्पतिः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यस्मा॑दृ॒ते न सिध्य॑ति य॒ज्ञो वि॑प॒श्चित॑श्च॒न। स धी॒नां योग॑मिन्वति॥

यस्मा॑त् । ऋ॒ते । न । सिध्य॑ति । य॒ज्ञः । वि॒पः॒ऽचितः॑ । च॒न । सः । धी॒नाम् । योग॑म् । इ॒न्व॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन। स धीनां योगमिन्वति॥

यस्मात्। ऋते। न। सिध्यति। यज्ञः। विपःऽचितः। चन। सः। धीनाम्। योगम्। इन्वति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 35 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यस्मात्) जिस (विपश्चितः) अनन्त विद्यावाले सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर के (ऋते) विना (यज्ञः) जो कि दृष्टिगोचर संसार है, सो (चन) कभी (न सिध्यति) सिद्ध नहीं हो सकता, (सः) वह जगदीश्वर सब मनुष्यों की (धीनाम्) बुद्धि और कर्मों के (योगम्) संयोग को (इन्वति) व्याप्त होता वा जानता है॥७॥
Essence
व्यापक सब में रहनेवाले ईश्वर और व्याप्य जगत् का नित्य सम्बन्ध है। वही सब संसार को रचकर तथा धारण करके सब की बुद्धि और कर्मों को अच्छी प्रकार जानकर सब प्राणियों के लिये उनके शुभ अशुभ कर्मों के अनुसार सुख दुःखरूप फल को देता है। कभी ईश्वर को छोड़ के अपने आप स्वभावमात्र से सिद्ध होनेवाला अर्थात् जिसका कोई स्वामी न हो, ऐसा संसार नहीं हो सकता, क्योंकि जड़ पदार्थों के अचेतन होने से यथायोग्य नियम के साथ उत्पन्न होने की योग्यता कभी नहीं होती॥७॥
Subject
वही सब जगत् को रचता है, इसका उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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