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Rigveda Mandal 1 / Sukta 18 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/18/6
Devata- सदसस्पतिः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सद॑स॒स्पति॒मद्भु॑तं प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्। स॒निं मे॒धाम॑यासिषम्॥

सद॑सः । पति॑म् । अद्भु॑तम् । प्रि॒यम् । इन्द्र॑स्य । काम्य॑म् । स॒निम् । मे॒धाम् । अ॒या॒सि॒ष॒म् ॥

Mantra without Swara
सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्। सनिं मेधामयासिषम्॥

सदसः। पतिम्। अद्भुतम्। प्रियम्। इन्द्रस्य। काम्यम्। सनिम्। मेधाम्। अयासिषम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 35 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
मैं (इन्द्रस्य) जो सब प्राणियों को ऐश्वर्य्य देने (काम्यम्) उत्तम (सनिम्) पाप-पुण्य कर्मों के यथायोग्य फल देने और (प्रियम्) प्राणियों को प्रसन्न करानेवाले (अद्भुतम्) आश्चर्य्यमय गुण और स्वभाव स्वरूप (सदसस्पतिम्) और जिसमें विद्वान् धार्मिक न्याय करनेवाले स्थित हों, उस सभा के स्वामी परमेश्वर की उपासना और सब उत्तम गुण स्वभाव परोपकारी सभापति को प्राप्त होके (मेधाम्) उत्तम ज्ञान को धारण करनेवाली बुद्धि को (अयासिषम्) प्राप्त होऊँ॥६॥
Essence
जो मनुष्य सर्वशक्तिमान् सबके अधिष्ठाता और सब आनन्द के देनेवाले परमेश्वर की उपासना करते और उत्कृष्ट न्यायाधीश को प्राप्त होते हैं, वे ही सब शास्त्रों के बोध से प्रसिद्ध क्रियाओं से युक्त बुद्धियों को प्राप्त और पुरुषार्थी होकर विद्वान् होते हैं॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से परमेश्वर के गुणों का उपदेश किया है-